पीलीभीत। अवैध खनन, अतिक्रमण और प्रदूषण से मैली हो चुकीं देहवा और कटना नदियां अपनी बदहाली पर सिसक रही हैं। नदियों को नया जीवन देने के लिए चुनाव से पहले प्रदेश सरकार ने प्रदेेश की 50 नदियों की सूची में इन्हें भी शामिल किया था। लेकिन चुनाव के बाद नदियों को संवारने की योजना ठंडे बस्ते में डाल दी गई। अब ये नदियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।
पीलीभीत को नदियों की जननी कहा जाता है। लखनऊ की शान गोमती का उद्गम यहीं से हुआ है। यहां से शाहजहांपुर व हरदोई तक 195.9 किलोमीटर तक देहवा नदी और पीलीभीत से शाहजहांपुर तक 35.8567 किलोमीटर तक कटना नदी की सूरत संवारनी थी। कटना नदी बीसलपुर, बिलसंडा से होकर निकलती है। विलुप्त होती प्रदेश की 50 नदियों को संवारने के लिए ग्राम विकास आयुक्त वीरेंद्र कुमार सिंह ने आदेश जारी किया था।
मनरेगा के तहत नदियों को संवारने के कार्य होने थे। साथ ही इनको रिमोट सेंसिंग पर लेकर जीआईएस के जरिये चिह्निकरण भी किया जाना था। इनका प्रवाह बढ़ाने के साथ नदियों के दोनों तरफ अवैध कब्जे हटाए जाने थे, लेकिन चुनाव के बाद सरकार ने नदियों की तरफ ध्यान नहीं दिया। बजट न मिलने के कारण जिला प्रशासन भी योजना को लेकर उदासीन है।
किनारों पर अवैैध कब्जे, अवैध खनन
बीसलपुर क्षेत्र में कटना नदी से सबसे ज्यादा अवैध खनन होता है। इसके अलावा प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। शहर की गंदगी नालों के जरिये देहवा नदी में पहुंच रही है। कई जगह तो इन नदियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। दोनों नदियों का आंचल सिकुड़ता जा रहा है। कई जगह अवैध कब्जे भी हो चुके हैं। उम्मीद थी कि अब जिले की इन दो महत्वपूर्ण नदियों को नया जीवन मिल जाएगा, लेकिन अनदेखी के चलते नदियों की सूरत बिगड़ती जा रही है। बीसलपुर क्षेत्र में कटना नदी नाले का रूप ले चुकी है।
जिले की देहवा और कटना नदी को संवारने के लिए शासन से पत्र जारी हुआ था। उसके तहत किसी तरह का बजट नहीं मिला, जिस कारण आगे काम नहीं हो सका। बजट मिलते ही कार्य कराए जाएंगे। प्रशासन स्तर से देखेंगे कि मनरेगा के तहत जितना कार्य कराया जा सकता है, कराया जाएगा। -पुलकित खरे, डीएम