शहर में बुधवार की रात बारहवीं रबी उल अव्वल के निकाले जाने वाले जुलूस में अलग झंडे के साथ शामिल होने अथवा अलग से जुलूस निकालने की जिद पर अड़े अल्लाहू मियां की दरगाह से ताल्लुक रखने वाले मौलाना हसन मियां कदीरी व उनके समर्थकों को 12 बजे के बाद दूसरे रास्ते से जुलूस निकालने की अनुमति देना ही टकराव का मुख्य कारण बना। यही नहीं खुफिया विभाग के चेताने पर प्रसासन ने स्थिति से निपटने के लिए भारी फोर्स तो शहर में बुला लिया, लेकिन वार्ता के जरिये जो प्रयास किए जाने चाहिए थे उसमें कहीं न कहीं प्रशासन की कमी ही दिखी।
बुधवार रात हसनमियां कदीरी गुट के लोगों व पुलिस में हुई भिड़ंत के बाद से शहर में व्याप्त तनाव के लिए भले ही पुलिस व प्रशासन हसनमियां कदीरी के लोगों को एकतरफा जिम्मेदार ठहरा रहा हो, लेकिन पूरे घटनाक्रम पर अगर नजर डालें तो एक हद तक प्रशासन दोषी रहा है। पिछले साल भी कुछ इसी तरह का माहौल था। तब प्रशासन ने सूझबूझ से काम लिया था।
आस्ताने हशमतिया के जरताब रजा ने उस दौरान भी हसनमियां कदीरी के लोगों के जुलूस में शामिल होने को लेकर पहले जुलूस निकालने से इंकार कर दिया था। तब प्रशासन ने हसन मियां कदीरी के जुलूस को परंपरागत तरीके से अलग ढंग से जुलूस की अनुमति न देने का हवाला देते हुए स्पष्ट कह दिया था कि यदि हसन मियां कदीरी व उनके समर्थकों ने जबरिया जुलूस निकालने की कोशिश की तो उनसे प्रशासन सख्ती से निपटेगा।
प्रशासन ने अंतिम दिन जरताब रजा को यह भरोसा दिलाकर कि हसनमियां के समर्थक जुलूस में शामिल नहीं होंगे, उन्हें जुलूस निकालने के लिए राजी कर लिया था। लेकिन हसनमियां कदीरी से डीएम, सिटी मजिस्ट्रेट व एएसपी ने अंत तक जुलूस न निकालने की बात नहीं कही। इसकी जबह उन्हें कभी 12 बजे के बाद जुलूस निकालने तो कभी जुलूस के लिए मार्ग देख कर आने की बात कह गुमराह करते रहने का काम किया।
लोगों का मानना है कि यदि प्रशासन स्पष्ट रूप से हसनमियां कदीरी व उनके समर्थकों को जुलूस निकालने से मना कर देता अथवा शहर के अन्य जिम्मेदार लोगों, धर्मगुरुओं को बीच में डाल दोनों पक्षों से बीच का रास्ता निकाल लेता तो शायद यह घटना नहीं घटती।