करीब सात दशक से आस्ताने हशमतिया से अंजुमाने गुलामे गौस तंजीम के जरिये निकाले जाने वाले जुलूस-ए-मोहम्मदी में विवाद की शुरुआत पांच साल पहले हुई थी, जब शहर के बेलो वाले चौराहे पर हसन मियां कदीरी गुट द्वारा ठेले पर लाउडस्पीकर लगा जुलूस को आगे ले जाने की कोशिश की गई थी। तीन साल तक तो दोनों गुट गिले-शिकवे के साथ खुशी के इस मौके पर एक साथ ऊपरी दिल से शरीक तो होते रहे, लेकिन इसी के साथ दोनों गुटों में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। यही वजह रही कि पिछले साल दोनों गुट जुलूस को लेकर खुल कर आमने-सामने आ गए थे।
शहर के पुराने लोगों की मानें तो हमेशा जुलूस की सदारत आस्ताने हशमतिया से जुड़े लोग ही करते रहे हैं। जुलूस जिस गली मोहल्ले से निकलता है उसके लोग पीछे से जुड़ते चले जाते हैं। सात दशकों से यह सिलसिला चलता आ रहा है। हसनमियां कदीरी समर्थक लोग जुलूस में बेलो वाले चौराहे पर पीछे से शामिल होते थे। वर्ष 2010 में भी यह जुलूस आस्ताने हशमतिया से परंपरागत ढंग से निकाला जा रहा था। जुलूस के बेलो वाले चौराहे पर पहुंचने से पहले कदीरी ग्रुप के लोग हाथ में हरा झंडा लिए ठेले पर लाउडस्पीकर लगाए पीछे से शामिल होने के बजाय जुलूस के आगे आ गए। शहर मुफ्ती मासूम रजा व उनके छोटे भाई इदरीश रजा ने जब ऐतराज जताया तो कदीरी समर्थकों ने धक्का-मुक्की शुरू कर दी, जिससे शहर मुफ्ती मामूली रूप से घायल भी हो गए थे। उस दौरान तत्कालीन डीएम कौशलराज शर्मा, एसपी प्रेम गौतम व सिओ सिटी रफीक अहमद को मौके पर पहुंच स्थिति को नियंत्रण में करना पड़ा था। इसके बाद से दोनों गुटों में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई।
इधर, हसनमियां कदीरी के साथ भी शहर के तमाम लोग जुड़ने लगे। जुलूस में समर्थकों का सैलाब दिखे इसके लिए दो साल पहले हसनमियां कदीरी ने अलग रंग के झंडे के साथ शामिल होने की बात कहने लगे। उधर जरताब रजा गुट उनकी नुमाइंदगी को किसी भी कीमत पर अलग पहचान देने को तैयार नहीं था। उनके द्वारा पहले अलग रंग के झंडे पर ऐतराज जताने व बाद में किसी भी कीमत में जुलूस के साथ शामिल न होने देने की जिद को भी इसी का हिस्सा माना जा रहा है। कुल मिलाकर वर्चस्व की इस लड़ाई में शहर का अमन व सुकून खतरे में पड़ता जा रहा है।
वर्चस्व ने बदला टोपी-झंडे का रंग
पुराने लोगों की माने तो जुलूस-ए-मोहम्मदी के दौरान हरे रंग के झंडे लोगों के हाथों में होते थे। टोपी भी लोग अपने पसंदीदा रंग की पहन लेते थे। पर बर्चस्व की इस लड़ाई में समर्थकों की भीड़ अलग दिखाने के लिए एक वही इस्लामिक रंग के हरे झंडे व सफेद टोपी लगा कर चलते हैं तो कदीरी गुट के लोग काली टोपी व काले झंडे लगाते हैं।