फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भैरोंकलां के रघुवीर की फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने किया निरस्त

विज्ञापन
विज्ञापन
पीलीभीत। उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने थाना माधोटांडा के गांव भैरोंकलां निवासी रघुवीर की फांसी की सजा को निरस्त कर दिया है। रघुवीर को 11 वर्षीय बच्ची की दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में सात महीने पहले जनपद न्यायालय ने मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने उसे जेल से रिहा करने का भी आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार ने दिया है।
विज्ञापन

थाना माधोटांडामें एक ग्रामीण ने 22 फरवरी 2016 को रिपोर्ट दर्ज कराई था। रिपोर्ट के अनुसार उसकी 11 वर्षीय बेटी 21 फरवरी, 2016 को खेत पर खाना देने गई थी, लेकिन इसके बाद घर नहीं लौटी। खोजबीन करने पर अगले दिन गांव से कुछ दूर झाड़ियों में बच्ची का शव मिला। उसकी दुष्कर्म के बाद हत्या की गई थी। माधोटांडा पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के बाद 26 फरवरी, 2016 को गांव भैरोंकलां निवासी रघुवीर को गिरफ्तार किया था। बकौल पुलिस, पूछताछ में रघुवीर ने स्वीकार किया कि उसने दुष्कर्म के बाद बच्ची की हत्या कर दी। उसके कुंडल लूटने के बाद शव झाड़ियों में फेंक दिया। पुलिस ने उसके घर से मृतका के कुंडल बरामद होने की बात भी कही थी। विवेचना के बाद आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया गया। अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में सात गवाह पेश किए गए। मामले की सुनवाई के बाद अपर सत्र न्यायाधीश प्रथम संजीव शुक्ला ने 26 सितंबर, 2016 को अभियुक्त रघुवीर को फांसी की सजा सुनाई। साथ ही 35000 रुपये का जुर्माना भी डाला था। इसके खिलाफ अभियुक्त की ओर से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। मृत्युदंड के इस मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने की। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार ने सभी पक्षों को सुना। हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि यह परिस्थिति जन्य अपराध का मामला है। घटना का कोई भी प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। अभियुक्त के खिलाफ केवल कुंडल बरामदगी की गवाही है। अदालत में स्वतंत्र गवाहों लीलाधर और बाबूराम को पेश नहीं किया गया। जबकि कुंडल बरामदगी के यही दोनों गवाह थे। यह भी कहा गया कि पार्टीबंदी के कारण रघुवीर को फंसा दिया गया था। यह बात रघुवीर ने जनपद न्यायालय में भी कही थी, लेकिन उसकी नहीं सुनी गई। उच्च न्यायालय ने पारित निर्णय में लिखा है कि यह परिस्थिति जन्य अपराध का मामला है। अभियोजन पक्ष संदेह से परे मामला साबित नहीं कर सका है। इस कारण संदेह का लाभ देते हुए रघुवीर को बरी किया जाता है। फांसी की सजा समाप्त की जाती है। रघुवीर की ओर से न्यायमित्र सगीर अहमद ने पैरवी की थी। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया है कि रघुवीर एक निजी मुचलका और दो जमानती जिला अदालत में दाखिल करेगा। एक अंडरटेकिंग भी देगा, अगर सर्वोच्च न्यायालय में अपील होगी तब वह उस अपील में स्वयं ही हाजिर हो जाएगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें