पीलीभीत। जिले के किसान, फर्नीचर व दरी के कारीगरों के लिए अच्छी खबर है। वह अपने उत्पाद विदेेशों में निर्यात कर सकेंगे। उनको बिचौलियों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। जिला उद्योग एवं उद्यमिता प्रोत्साहन केंद्र में पंजीकरण कराकर अपने उत्पाद निर्यात कर पाएंगे। शुक्रवार को हुई जिला निर्यात प्रोत्साहन समिति की बैठक में चावल, फर्नीचर और दरी उत्पादों को भी निर्यात के लिए शामिल कर लिया गया।
करीब डेढ़ साल पहले हुई जिला निर्यात प्रोत्साहन समिति की बैठक में निर्यात के लिए सिर्फ बांसुरी को चुना गया था। शुक्रवार को हुई बैठक में चावल, फर्नीचर और दरी उद्योग को निर्यात के लिए चुन लिया गया। अभी तक जिले की दो फर्म ही चावल का निर्यात विदेशों में करती हैं। जिनके माध्यम से खाड़ी देशों के साथ अफ्रीकी देशों में पीलीभीत का चावल भेजा जाता है। लेकिन किसानों को इसका सीधा लाभ नहीं मिल पाता। अब किसान सीधे अपना चावल विदेशों में भेज सकेंगे। इसके लिए जिला उद्योग एवं उद्यमिता प्रोत्साहन केंद्र मदद करेगा। दूसरी तरफ फर्नीचर, दरी और बांसुरी कारीगरों को बड़ी सहूलियत मिलेगी। उनको अपने उत्पाद की अच्छी कीमत मिलने के साथ विदेश में पहचान भी मिलेगी। इसके लिए जिला उद्योग केंद्र किसानों और छोटे उद्योगपतियों का पंजीकरण कराएगा।
जिले का बासमती चावल कई देशों में भेजा जाता है। प्रोत्साहन समिति की बैठक में डीएम ने चारों उत्पादों के निर्यात के लिए हरी झंडी दे दी। साथ ही जिला निर्यात एक्शन प्लान को भी मंजूरी दे दी। बैठक में उद्योगपतियों, कारीगरों ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने निर्यात को लेकर आ रही समस्याओं को भी रखा। कहा कि माल भेजने के लिए सुविधाएं बढ़ाई जाएं। बड़े उद्योगपतियों के साथ छोटे उद्योगपतियों और किसानों को सीधे इससे जोड़ा जाए। डीएम ने आश्वासन दिया कि ट्रांसपोर्ट की समस्या दूर की जाएगी।
डिस्ट्रिक्ट एक्सपोर्ट एक्शन प्लान हुआ मंजूर
जिला उद्योग एवं उद्यमिता प्रोत्साहन केंद्र जिले में निवेश और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए पूरे का सर्वे कराकर डिस्ट्रिक्ट एक्सपोर्ट एक्शन प्लान तैयार किया गया है। डीएम ने इसे अनुमोदित कर दिया है। अब इसे लागू कर दिया जाएगा। इसके तहत जिले के उत्पाद आसानी से विदेशों में भेजे जा सकेंगे। दूसरी तरफ जिले में निवेश बढ़ाने के लिए जल्द ही इंवेस्टर्स समिट कराने की तैयारी है।
योजना में एफपीओ को भी शामिल करने की तैयारी
किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को भी इन्वेस्टर्स समिट से जोड़ने की तैयारी है। जिले में सात एफपीओ हैं। इसमें कुछ आर्गेनिक कृषि उत्पाद तैयार करते हैं। वो सरकार की तरफ से सर्टिफाइड भी हैं। ऐसे एफपीओ के जरिये जिले में आर्गेनिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
‘एजेंसी के जरिए जिले में सर्वे कराकर डिस्ट्रिक्ट एक्सपोर्ट एक्शन प्लान तैयार किया गया है। जिले में कृषि, फर्नीचर के कई उत्पाद हैं, जिनको एक्सपोर्ट किया जा सकता है। प्लान में इसे शामिल किया गया है। शुक्रवार को हुई बैठक में डीएम ने प्लान को मंजूरी दे दी। साथ ही चार उत्पादों को निर्यात के लिए चुना गया है। इसमें बांसुरी पहले से शामिल है। अब चावल, दरी और फर्नीचर उत्पादों को भी शामिल कर लिया गया है।’
- आत्मदेव शर्मा, उपायुक्त जिला उद्योग एवं उद्यमिता प्रोत्साहन केंद्र
पिछले सीजन में 83 करोड़ का चावल जिले से हुआ था निर्यात
पीलीभीत। जिले में निर्यात को देखा जाए तो चावल और गेहूं को छोड़ बाकी उत्पादों को उतना बढ़ावा नहीं मिल पाता। पिछले सीजन में 83 करोड़ का चावल विदेशों में निर्यात किया गया। वहीं इस बार 78 हजार एमटी गेहूं विदेश भेजा गया। अब निर्यात प्रोत्साहन में शामिल होने के बाद फर्नीचर और दरी उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। तराई का अपना जिला कृषि प्रधान है। चार लाख किसान खेती करते हैं। इस बार ही धान का रकबा 1.35 लाख हेक्टेयर है। अभी तक किसान अपना धान बिचौलियों के हाथ बेचते हैं। अब उनका धान सीधे विदेश भेजा जा सकेगा। जिला उद्योग केंद्र इसके लिए कार्ययोजना तैयार करेगा।
करीब दस करोड़ का है बांसुरी कारोबार
बांसुरी उद्योग की बात करें तो एक करोड़ से ऊपर का टर्नओवर होता था। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में अब 30 लाख रुपये तक में सिमट गया है। मौजूदा स्थिति और खराब हो चुकी है। पीलीभीत में बांसुरी का कारोबार करीब सवा सौ साल पुराना है। सबसे पहले जिले के व्यवसायी नत्था शेख ने व्यावसायिक रूप से बांसुरी बनानी शुरू कीं। बांसुरी लायक बांस सिल्चर (असम) से मंगाया जाता था। नत्था शेख के बाद उनके बेटे अब्दुल नबी ने इस कारोबार को आगे बढ़ाया। इस कारोबार से करीब 75 व्यापारी और 800 कारीगर जुड़े हुए थे। बांसुरी अहमदाबाद, भोपाल और हैदराबाद की मंडी में सप्लाई होती थी। नबी एंड संस के कारीगरों ने ढाई इंच से लेकर 72 इंच तक की क्लासिकल बांसुरी तैयार कीं। इन बांसुरियों की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 250 रुपये से 40,000 रुपये तक रही। नबी एंड संस की बांसुरी मशहूर बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया और हर्षवर्धन के होठों तक पहुंची। बांसुरी कारोबारियों के अनुसार अब सिल्चर रेलवे वैगन के जरिए यहां मंगाना संभव नहीं रहा। जिले में फर्नीचर के उत्पाद बड़ी संख्या में बनते हैं और बाहर भी भेजे जाते हैं। ये कारोबार सालाना करीब दस करोड़ का है। एक वक्त में जिले में दरी का कारोबार भी अच्छा होता था, लेकिन मौजूदा स्थिति में बहुत कम लोग इस कारोबार से जुडे हैं।