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बाल दिवस : ... भूल गए चाचा को

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शहर के रेलवे स्टेशन चौराहे के पास ​स्थित नेहरू पार्क । संवाद
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पीलीभीत। धूल से सनी मूर्ति, वीराना पार्क, आसपास चारों तरफ ठेले व खोमचे। कुछ ऐसा ही नजारा था नेहरू पार्क का 14 नवंबर को। इस तारीख का पार्क में खड़ी मूर्ति से कुछ खास ताल्लुक है। यह सफेद मूर्ति किसी और की नहीं, बल्कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की है। बच्चे इन्हें चाचा नेहरू कहते हैं। गोवर्धन पर्व के सरकारी अवकाश के चलते सरकारी तंत्र बाल दिवस को ही भूल गया।
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पंडित जवाहर लाल नेहरू के 1964 में निधन के बाद देश की संसद में पास हुए प्रस्ताव के तहत हर साल 14 नवंबर को पं. नेहरू के जन्मदिवस को बाल दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पास हुआ था। नेहरू जी को बच्चों से विशेष लगाव था, इसी कारण 14 नवंबर को जवाहर लाल नेहरू की मूर्ति पर माल्यार्पण के साथ ही बच्चों के लिए कई कार्यक्रम भी कराए जाते थे, लेकिन इस बार दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा का अवकाश इस दिन घोषित कर दिया गया। सरकारी तंत्र को अवकाश याद रहा, लेकिन चाचा नेहरू को भूल गए। धूल धंसरित उनकी मूर्ति दिनभर इंतजार करती रही, लेकिन नेता से लेकर अधिकारी तक किसी को चाचा याद नहीं आए और न ही बाल दिवस।


ताज्जुब...कांग्रेसी ही भूल गए अपने नेता को
जवाहर लाल नेहरू कांग्रेसी थे। कांग्रेस सरकार ने ही 1964 में संसद में 14 नवंबर को देश में बाल दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पास कराया था। अब खुद कांग्रेसी ही इस दिन को भूल गए। नेहरू पार्क में एक भी कांग्रेसी नेता माल्यार्पण के लिए नहीं पहुंचा।
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