मुर्गा न खाने वाले दरगाह पर ही मुर्गा छोड़ देते हैं या फिर अन्य लोगों को दे देते हैं। मुर्गा व्यापारियों के अनुमान के मुताबिक करीब 70 हजार से अधिक मुर्गों के बिक्री होने की उम्मीद है। बाहर की मंडियों में मुर्गें का आर्डर दे दिया गया है। उर्स को लेकर दुकानें सज गई हैं। मेला कमेटी के सदस्य व्यवस्थाओं में जुटे हैं।
उर्स आने का इंतजार करते हैं बंजारा समुदाय के लोग
वैसे तो दरगाह से हर समुदाय के लोगों की आस्था है, लेकिन बंजारा समुदाय का दरगाह से खास लगाव है। ऐसा कहा जाता है कि दशकों पहले कभी दरगाह क्षेत्र से लेकर नेपाल तक बीहड़ जंगल होता था। बंजारा समुदाय के लोग नेपाल से मवेशियों की बड़ी तादाद में खरीद फरोख्त करते थे।
लौटते समय जंगल क्षेत्र में मवेशी गुम हो जाते थे। मान्यता है कि सेल्हा बाबा की दरगाह पर मन्नत मांगने पर मवेशी मिल जाते थे। इसलिए उर्स के दौरान जनपद और दूरदराज इलाकों से बंजारा समुदाय के लोग परिवार के साथ आकर रुकते हैं।
सेल्हा कमेटी के सदर अकीलुर्रहमान खां ने बताया कि दस मार्च से पांच रोजा उर्स के दौरान बड़ी तादाद में जायरीन पहुंचते हैं। जायरीनों की सुविधा का ध्यान रखते हुए व्यवस्थाएं की जा रही है। परंपरा के अनुसार मुर्गे काटने को लेकर सफाई व्यवस्था को बेहतर करने पर बल दिया जा रहा है।