कलीनगर। करोड़ों रुपये फूंकने के बाद भी गोमती नदी की धारा नहीं बह सकी। बारिश में इन दिनों जिले की सभी नदियां उफान पर हैं, लेकिन गोमती अब भी ठहरी हुई है। उसे कल-कल कर बहते देखने का सपना साकार नहीं हो पा रहा है। गोमती नदी को पुनर्जीवित करने के लिए कई प्रोजेक्ट बने। निर्माण कार्य के नाम पर करोड़ों रुपये भी खर्च कर दिए गए, लेकिन गोमती का उद्धार न हो सका।
लखनऊ की शान गोमती नदी का उद्गम स्थल माधोटांडा में है। दशकों से गोमती की अविरल धारा का प्रवाह बंद है। उद्गम स्थल के मुख्य स्रोत ही बंद हो गए। इससे नदी का अस्तित्व ही संकट में है। आलम यह है कि गोमती उद्गम स्थल के आगे जनपद की सीमा में ही कई स्थानों पर नदी की जमीन पर कब्जे हो गए हैं।
पूर्व में डीएम रहे पुलकित खरे ने गोमती में अविरल धारा बहाने का बीड़ा उठाया था। मनरेगा से कार्य योजना तैयार कर जनपद की सीमा में गोमती नदी की खोदाई कराई, लेकिन प्राकृतिक स्रोत बंद होने से नदी का प्रवाह जारी नहीं हो सका। कुछ समय बाद स्थिति फिर जस की तस हो गई। अब एसडीएम के रूप में कलीनगर तहसील का चार्ज लेने के बाद आशुतोष गुप्ता ने फिर अविरल धारा को लेकर मंथन शुरू किया है।
एक पखवाड़ा पूर्व जनसंवाद कार्यक्रम का आयोजन कर प्रशासनिक अफसरों के साथ प्रधान और जागरूक लोगों का सहयोग लेकर गोमती नदी में अविरल धारा बहाने की मुहिम शुरू की है। इसके लिए पहले नदी की सीमा में अतिक्रमण को चिह्नित करने का दावा किया जा रहा है, हालांकि अब तक इसके लिए कोई प्रयास शुरू नहीं हो सके हैं।
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पूर्व सरकारों में बनते रहे प्रोजेक्ट, होता रहा बंदरबांट
गोमती के जीर्णोद्धार को बसपा सरकार के कार्यकाल में 22 करोड़ के दो प्रोजेक्ट बनाए गए थे। इसमें कुछ धनराशि देकर काम भी कराए गए लेकिन कार्य मनरेगा से न होने की बात कहते हुए काम बीच में ही रोक दिया गया। तत्कालीन सपा सरकार में सिंचाई मंत्री रहे शिवपाल सिंह यादव ने गोमती को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। पहले प्रोजेक्ट में करोड़ों रुपये खर्च कर उद्गम स्थल की झीलों की खोदाई की गई। इसके बाद गोमती उद्गम स्थल तक 25 क्यूसेक पानी देने के लिए 1.90 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जब पानी छोड़ने की बारी आई तो उद्गम स्थल तक पानी ही नहीं पहुंच सका। उद्गम स्थल से जनपद सीमा तक खोदाई कर अविरल धारा बहाने के लिए एक और प्रोजेक्ट बनाया गया। इसे मंजूरी तो मिली लेकिन बजट जारी नहीं किया गया।
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गोमती के रास्ते पर कब्जों की भरमार
गोमती नदी के रास्ते पर अवैध कब्जेदारों ने कब्जे कर खेती करनी शुरू कर दी। जिले में गोमती नदी 33 गांवों से होकर गुजरती है। इनमें कई ऐसे गांव हैं जहां गोमती नदी के क्षेत्र में अवैध कब्जों की भरमार है। कई स्थानों पर खेती हो रही है और कई स्थानों पर गोमती की चौड़ाई नाम मात्र ही है। गोमती क्षेत्र को खाली कराने के प्रयास तो हुए, लेकिन कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में पड़ने से स्थिति जस की तस हो गई है।
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कई अभियान चलाए पर काम एक भी नहीं आया
गोमती नदी को पुनर्जीवित करने के लिए पूर्व में कई अभियान चलाए गए। गोमती उद्गम स्थल से गोमती संरक्षण के अभियान की भी शुरूआत हुई थी। पूरे 960 किमी लंबी यात्रा के बाद इसका समापन भी गंगा में समाहित होने वाले स्थान पर किया गया। इसमें स्वामी विज्ञानंद गंगा, जितेंद्र लोक भारती के आचार्य बृजेंद्र पाल सिंह, जैविक कृषि विशेषज्ञ राज कुुमार, पर्यावरणविद् चंद्रभूषण तिवारी जैसे दिग्गज भी शामिल हुए, लेकिन संरक्षण के नाम पर चलाया गया अभियान भी सफल नहीं हो सका। इसके अलावा कई अन्य क्षेत्रीय स्वयंसेवी संगठनों ने अभियान पर बयानबाजी तो खूब की लेकिन इसके बाद पलटकर नहीं देखा। जल पुरुष राजेंद्र सिंह के प्रयास भी सफल नहीं हुए। हाल ही में वाटर वूमेन शिप्रा पाठक ने गोमती की सीमा में पैदल भ्रमण के बाद अतिक्रमण को लेकर चिंता जताई।
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प्रशासन की दिलचस्पी से उद्गम स्थल पर हुए विकास कार्य
गोमती नदी की धारा तो अविरल नहीं हो सकी, लेकिन उद्गम स्थल का नजारा बदलने में प्रशासन का योगदान अहम रहा। परिसर क्षेत्र में सौंदर्यीकरण के साथ अन्य विकास कार्य कराए गए। गोमती मैया का मंदिर स्थापित किया गया। उद्गम स्थल आने वाले भक्तों की सुविधा के लिए कैंटीन का संचालन भी शुरू कराया गया, हालांकि अभी कैंटीन बंद है।