दंगे के जख्म ढाई साल बाद भी हरे हैं। कई सवाल जवाब ढूंढ रहे हैं। सदियों का भाईचारा आखिर कैसे टूट गया। पंचायत में आते-जाते लोगों पर हमले क्या सुनियोजित थे। भीड़ नेताओं की बात क्यों नहीं सुन रही थी।
मंदौड़ में कवाल कांड की कथित क्लिपिंग बांटने वाले कहां से आए थे और कहां चले गए। पुलिस के देखते-देखते लोग बेकाबू भी हुए और दंगे की आंच में झुलसे भी।
सात सितंबर 2013 की रात ढली तो जिले का गौरवशाली इतिहास खूनी हो चुका था। आठ सितंबर की सुबह पुलिस-प्रशासन के अधिकारी नाकाम हो चुके थे। सेना बुलाई गई, कर्फ्यू लग गया।
देश के इतिहास में स्वर्णिम योगदान करने वाले मुजफ्फरनगर के इतिहास में यह पहली सांप्रदायिक हिंसा थी, जिसने देहात को अपनी चपेट में ले लिया। दर्द सहते-सहते दो साल बीत गए। हर जख्म आज भी ताजा है। दंगे की भूल को कोई भूलने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है।
क्या हुआ था सात सितंबर को?
मलिकपुरा के ममेरे भाई गौरव और सचिन की हत्या के बाद सात सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ में पंचायत आहूत की गई थी। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर सवार होकर नंगला मंदौड़ जा रहे लोगों पर शाहपुर के बसीकलां में हमला हुआ। वारदात में घायल लोग पंचायत में पहुंचे तो मामला गरमा गया। भीड़ बेकाबू थी और नेता लाचार। पंचायत के दौरान सिखेड़ा थाने के पास कांधला के युवक की हत्या कर दी गई। पंचायत खत्म होते-होते शहर में दंगा भड़क उठा। पत्रकार राजेश वर्मा, दामोदर चायवाले की हत्या की हत्या कर दी गई। मंदौड़ से लौट रहे लोगों पर जौली गंगनहर, पुरबालियान, शेरनगर समेत अन्य कई जगह पर हमले हुए। अफवाहें फैल गईं और पुलिस-प्रशासन नाकाम रहा। कर्फ्यू लगा दिया गया। आठ सितंबर की सुबह जिले को सेना के हवाले कर दिया गया था।
पहले दिन मारे गए थे 10 लोग
सात सितंबर 2013 की शाम को भड़के दंगे में पहले दिन करीब 10 लोगों की हत्या कर दी गई थी। पंचायत में पहुंचे लोगों के अपने घर नहीं लौटने पर अफवाहें फैल गई। प्रशासन ने समाचार पत्र नहीं बंटने दिए तो भ्रम की स्थिति बन गई। यही कारण रहा कि आठ सितंबर की सुबह दंगे की चिंगारी ने रौद्र रूप ले लिया था।
किसके हैं वो खाली घर?
दंगे के ढाई साल बाद भी कई गांवों में अल्पसंख्यक समुदाय के खाली घरों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। अधिकतर लोगों को पुनर्वास सहायता मिल चुकी है, लेकिन सवाल है कि पुराने घर अब किसके हैं। दंगा पीड़ितों का कहना है कि वह अब अपने गांव नहीं लौटेंगे।