मुजफ्फरनगर। जनपद ही नहीं देश में 2013 के बाद चर्चित हुए गांव कवाल की आबो हवा इस बार बदली नजर आई। सांप्रदायिक आधार पर बंटने वाले इस गांव के दोनों पक्षों का झुकाव इस बार सपा की तरफ नजर आया। इस गांव में बिजनौर लोकसभा क्षेत्र से सपा के प्रत्याशी दीपक सैनी को अच्छी बढ़त मिल सकती है।
2013 में दंगे की शुरूआत कवाल गांव से हुई थी। एक दशक तक नेताओं के भाषणों में यह गांव छाया रहा। इस गांव में हुई तीन मौतों के बाद जनपद से लेकर प्रदेश और देश में वोटों का ध्रुवीकरण हुआ। 2013 के बाद से अब तक गांव में जितने भी चुनाव हुए, उसमें लोकसभा, विधानसभा, प्रधानी आदि सभी में ध्रुवीकरण हुआ। शुक्रवार को लोकसभा चुनाव यहां पूरी तरह सांप्रदायिक माहौल से मुक्त नजर आया। गांव में हिंदू जाति में सैनी समाज की बहुलता है। सपा ने इस बार बिजनौर से दीपक सैनी को प्रत्याशी बनाया है। जबकि मुस्लिम समाज यहां पहले से ही सपा को वोट करता आया है। सैनी प्रत्याशी होने के कारण सैनी समाज के अधिकांश वोटों का झुकाव सपा की ओर नजर आया।
पूरे गांव में तनाव रहित वोट पड़ा। गांव के कई लोगों से बात हुई तो उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि लंबे समय बाद दोनों पक्षों के अधिकतम लोग एक ही पार्टी को वोट कर रहे हैं। गांव में 7659 वोट में से 4540 वोट पड़े हैं। पूर्व प्रधान महेंद्र सैनी का कहना है कि 15-20 साल बाद गांव में ऐसा माहौल बना कि दोनों पक्षों ने एक राय में वोट डाला। संवाद
शुकतीर्थ में आगे दिखाई दी साइकिल
गंगा तट पर बसे शुकतीर्थ में भी इस बार माहौल बदला नजर आया। गांव में पहुंची टीम ने लोगों से बात की तो सपा प्रत्याशी दीपक सैनी के प्रति अधिक रुझान नजर आया। सैनी बाहुल्य इस गांव में मुस्लिम वोट नहीं हैं। गांव के लोगों का कहना था कि इस बार का चुनाव जाति आधारित हो रहा है। सब लोग अपनी जाति के प्रत्याशी को पसंद कर रहे हैं तो हम भी अपनी जाति के साथ ही जा रहे हैं।