- आज शुकतीर्थ में मनाई जाएगी पुण्यतिथि
संवाद न्यूज एजेंसी
मोरना (मुजफ्फरनगर)। वीतराग स्वामी कल्याणदेव देश की ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने वैभव और अन्य आडम्बरों से दूर रहकर निष्काम सेवा के पथ पर तप, त्याग और अथक पुरुषार्थ की अमिट गाथा लिखी। ग्रामोत्थान के लिए उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सैंकड़ों संस्थाएं खड़ी की। स्वामी जी संत समाज के मुकुट थे। आज शुकतीर्थ में उनकी पुण्यतिथि मनाई जाएगी।
शुकतीर्थ के जीर्णोद्धारक स्वामी कल्याणदेव विलक्षण और अनूठे संत थे। अपने अदम्य साहस से उन्होंने जो संकल्प ठान लिया, उसे निष्ठा से पूरा किया। वर्ष 1926 में पहली पाठशाला जिले के गांव दुधाहेड़ी में खुलवाई थी। फिर संत के महाप्रयाण तक स्कूल, कालेज, महाविद्यालय, पॉलिटेक्निक, आयुर्वेदिक कालेज, गुरुकुल तथा धर्मार्थ चिकित्सालय, गोशालाएं, वृद्धाश्रम, छात्रावास आदि सैकड़ों संस्थाए स्वामी जी की कृपा से स्थापित होती गई । उनकी स्मरणशक्ति बेमिसाल थी। गांव का जिक्र आते ही कई पीढ़ियों का नाम बताकर हतप्रभ कर देते थे। फटे-पुराने कपड़े पहनते थे। संयमी संत ने पैदल-पैदल बड़ी यात्राएं की तथा जीवन भर रिक्शे में नहीं बैठे। जो भी स्वामी जी से मिलने आते थे, उन्हें वात्सल्य में केला छीलकर खिलाते थे।
पद्मश्री और पद्मभूषण का शिक्षा ऋषि को मिला सम्मान
मोरना। विशिष्ट राष्ट्र सेवाओं के लिए स्वामी कल्याणदेव को भारत सरकार ने वर्ष 1982 में तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने ''पद्मश्री'' से सम्मानित किया था। वर्ष 1993 में वीतराग संत को पूर्व पीएम गुलजारी लाल नन्दा की स्मृति में पहला ''नन्दा नैतिक पुरुस्कार'' तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.शंकर दयाल शर्मा ने प्रदान किया। वर्ष 2000 में महान समाज सेवा कार्यो के लिए शिक्षा ऋषि को ''पद्मभूषण'' से तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. केआर नारायणन ने अलंकृत किया।