विश्व थैलेसीमिया दिवस
जिला चिकित्सालय में केवल थैलेसीमिया के मरीजों को केवल रक्त चढ़ाने की ही व्यवस्था
संवाद न्यूज एजेंसी
मुजफ्फरनगर। खतरनाक बीमारी थैलेसीमिया के इलाज की जिले में व्यवस्था नहीं है। मरीजों को इसके इलाज के लिए मेरठ मेडिकल कॉलेज या अन्य हायर सेंटर जाना पड़ता है। जिला चिकित्सालय में केवल थैलेसीमिया के मरीजों को खून चढ़ाने की सुविधा ही हैं। फिलहाल जिले में 65 से अधिक मरीज इस बीमारी से पीड़ित है।
जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. महावीर सिंह फौजदार ने बताया कि थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाली रक्त बीमारी है। इससे शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है। ऐसे में रक्तक्षीणता के लक्षण प्रकट होते हैं। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है।
इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की भारी कमी होने लगती है, जिसकी वजह से उसे बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि थैलेसीमिया का कोई स्थायी इलाज नहीं है। इसमें जब भी खून की कमी होती है तो बाहरी खून चढ़ाया जाता है। जिला चिकित्सालय में केवल इन रोगियों को खून चढ़ाने की ही व्यवस्था है।
ये होती है जांच, जिनकी जिले में व्यवस्था नहीं
जिला चिकित्सालय (पुरुष) के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश कुमार ने बताया कि थैलेसीमिया का पता लगाने के लिए ब्लड जांच के साथ एचपीएलसी (हाई परफोर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी) की जांच की जाती है। जिला चिकित्सालय में इसकी जांच की कोई सुविधा नहीं है। इस जांच की सुविधा हायर सेंटर्स में ही है।
यह है थैलेसीमिया के लक्षण
- सूखता चेहरा
- लगातार बीमार रहना
- वजन ना ब़ढ़ना
-लीवर और स्प्लीन में सूजन
- शारीरिक विकास में कमी
- अत्यधिक थकान
थैलेसीमिया से बचाव एवं सावधानी
- विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जांच कराएं।
- गर्भावस्था के दौरान इसकी जांच कराएं।
- रोगी की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें।
- समय पर दवाइयां लें और इलाज पूरा लें।