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Muzaffarnagar News: खाते में पैसा, 135 प्रस्ताव भी पास, राजनीतिक उठापटक में अटका विकास

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संवाद न्यूज एजेंसी
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मुजफ्फरनगर। नगर पालिका बोर्ड में 135 विकास कार्यों के प्रस्ताव पास होने और टेंडर जारी होने के बाद भी विकास कार्य शुरू नहीं हो पाए हैं। पालिका के खजाने में करीब 71 करोड़ रुपये भी है और विकास के लिए समय भी था। इसके बावजूद शहर के विकास की रफ्तार पर ब्रेक लग गया है। जनप्रतिनिधियों की आपसी खींचतान और कानून में उलझे प्रशासन की वजह से मुश्किल हुई।
नगर पालिका की 13 जुलाई 2022 की बोर्ड बैठक में 135 प्रस्ताव पास हुए। इन प्रस्तावों में शहर के प्रत्येक वार्ड की टूटी सड़कों को बनवाने से लेकर गरीबों के लिए एंबुलेंस, सिटी बस, अंतिम यात्रा वाहन तक शामिल है। सभासदों को लग रहा था कि अब उनके वार्ड के दिन संवरेंगे। निकाय चुनाव से पहले उनके वार्डों की कायाकल्प हो जाएगी। प्रस्ताव को पांच माह बीत चुके हैं, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी।
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पालिका के खजाने में इन विकास कार्यों के लिए 71 करोड़ बचा है। चेयरपर्सन अंजू अग्रवाल और सभासदों के बीच खींचतान रही। अंजू अग्रवाल ने कौशल विकास राज्यमंत्री कपिल देव अग्रवाल पर भी आरोप लगाए। अफसरों की अनदेखी का आलम यह हुआ कि ये सब काम अधूरे ही रह गए। चेयरपर्सन अंजू अग्रवाल से चार्ज छिन गया तो अफसर भी शहर में कुछ नहीं कर पाए। पालिका की राजनीति में शहर का विकास ठप हो गया।
ये होने थे मुख्य काम
- पालिका का अपना पेट्रोल, सीएनजी पंप
- शहर की गरीब जनता के लिए एंबुलेंस
- बाईपास तक के लिए दो इलेक्ट्रिक बस
- श्मशान घाट में शवों के लिए दो डीप फ्रीजर
- मजदूरों के लिए चार स्थानों पर कैंटीन
- कूड़ा घर हटाकर आठ स्थानों पर कांपेक्टर
- रोजगार बढ़ाने को कई स्थानों पर मार्केट
50 वार्डों में बन जाती सड़कें
पालिका की बोर्ड बैठक में पास हुए प्रस्ताव में सभी 50 वार्डों में टूटी सड़कों का निर्माण होना था। काम हो जाते तो शहर नए रूप में चमचमाता दिखाई देता। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और हावी अफसरशाही अवरोध का कारण बनी।
सभी कार्यों के हो चुके हैं टेंडर
हमने बोर्ड से सभी प्रस्ताव पास करा दिए और कार्यों के टेंडर भी जारी हो चुके है। मुझे घेरकर कुर्सी से तो हटा दिया, अफसर विकास कार्य एक भी नहीं करा सके। विकास में बाधक बने लोगों से भी जनता को सवाल करने चाहिए। - अंजू अग्रवाल, चेयरपर्सन
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शहर की जनता की क्या खता
पालिका में विकास की गेंद कभी जनप्रतिनिधियों और कभी अफसरों के पाले में रही, लेकिन काम शुरू नहीं हो पाए। पालिका के जिम्मेदार अफसर अपने दफ्तरों से गायब मिले। एक-दूसरे पर टाल-मटोल होती रही। सवाल यह है कि विकास के लिए वोट देने वाली जनता की इस पूरे मामले में कहां खता है।
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