परशुराम के तप से अटाली से पुरा तक प्रकट हुए थे महादेव
मदन बालियान
मुजफ्फरनगर। हिंडन (प्राचीन नाम हरनंदी) नदी सदियों के इतिहास की गवाह है। कभी ऋषि जमदग्नि और उनके बेटे परशुराम ने इसी नदी के किनारे भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। महादेव प्रकट हुए तो नदी किनारे जिले के अटाली से लेकर बागपत के पुरा तक चार मंदिरों की स्थापना कराई गई थी। पुरा के श्री परशुरामेश्वर महादेव मंदिर में हर साल लाखों कांवड़िये जलाभिषेक करते हैं।
जिले में हिंडन नदी के किनारे पर अटाली-चरौली गांव के बीच प्राचीन सिद्ध पीठ मंदिर की मान्यता दूर तक है। हड़ौली, कपूरगढ़ और इसके बाद बागपत के पुरा में हिंडन नदी किनारे प्राचीन सिद्ध मंदिर हैं। हड़ौली गांव के 80 वर्षीय सहज राम बताते हैं कि बुजुर्गों ने बताया था कि भगवान परशुराम की तपस्या के बाद इन चारों मंदिरों की स्थापना हुई थी। चारों जगह प्राचीन शिवलिंग हैं, जिनकी मान्यता आज भी दूर-दराज के क्षेत्र तक तक हैं। हड़ौली के किसान नरेश पाल (65) बताते हैं कि गांव के प्राचीन शिव मंदिर में कांवड़िये भी शिवरात्रि पर आकर जलाभिषेक करते हैं। मंदिर का इतिहास ऋषि जमदग्नि और भगवान परशुराम से जुड़ा है।
पश्चाताप और परशुराम की तपस्या
कथा सुनाई जाती है कि हस्तिनापुर के राजा सहस्रबाहु हिंडन नदी के कजरी वन में शिकार खेलने गए थे। कुटिया में अकेली देख ऋषि जमदग्नि की पत्नी रेणुका को राजा जबरदस्ती अपने साथ हस्तिनापुर ले गए। एक दिन बाद रेणुका किसी तरह वापस पहुंची तो ऋषि ने अपने साथ रखने से इनकार कर दिया। ऋषि के आदेश पर पितृभक्ति दिखाते हुए उनके चौथे बेटे परशुराम ने अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दिया था। लेकिन आत्मग्लानि से परशुराम ने भगवान शिव की तपस्या शुरू की। पुरा में भगवान शिव प्रकट हुए थे और यहां आज भी कांवड़िये जलाभिषेक करते हैं। बताते हैं कि परशुराम और उनके पिता ऋषि जमदग्नि ने अटाली, हड़ौली और कपूरगढ़ में भी तपस्या की थी, यही वजह है कि चारों जगह भगवान शिव के मंदिर बनवाए गए।
कपूरगढ़ मंदिर की एक कथा यह भी
शाहपुर मार्ग स्थित गांव कपूरगढ़ का प्राचीन सिद्धपीठ आनंद कुटी शिव मंदिर आस्था और विश्वास का केंद्र है। बताते हैं कि हिंडन नदी के किनारे भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि ने भगवान भोलेनाथ की तपस्या कर मंदिर की स्थापना की थी। जैतपुर गांव निवासी योगेंद्र कुमार का कहना है कि भगवान शिव का यह एतिहासिक मंदिर है, जलाभिषेक के साथ जो भी मुराद यहां मांगी वह पूरी हो गई। कपूरगढ़ मंदिर के महंत जयराम ब्रह्मचारी ने बताया पूर्व काल में मंदिर प्रांगण के सिद्ध स्थान पर अनेक ऋषि-मुनियों ने सौ बार श्रीमद्भागवत कथा सुनाई। इसी कारण सिद्धपीठ मंदिर क्षेत्र में सप्ता कुटी के नाम से भी प्रसिद्ध है। भूमा निकेतन हरिद्वार के महंत ब्रह्मलीन 1008 श्री लक्ष्येश्वर जी महाराज की सिद्ध पीठ मंदिर के प्रति विशेष आस्था रही है।