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कारगिल के शहीदों को याद कर छलक आती हैं आंखें

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नगर के नुमाइश मैदान में स्थित शहीद स्मारक। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
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कारगिल के शहीदों को याद कर छलक आती हैं आंखें
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मुजफ्फरनगर। कारगिल विजय में शहीद हुए जिले के पांच वीर सैनिकों को हमेशा याद किया जाएगा। परिवार और जिले के लोग जब भी इनकी वीर गाथा को याद करते है, गर्व से आंसू छलक जाते हैं। पचेंडा के शहीद बचन सिंह के बेटे हेमंत ने पिता के सपने को साकार करते हुए उन्हीं की रेजीमेंट में कैप्टन के पद से राष्ट्र सेवा शुरू कर पूरे परिवार का सर गर्व से ऊंचा किया है।
कारगिल में ऑपरेशन विजय के दौरान दुश्मन सैनिकों के छक्के छुड़ाने वाले शहर से सटे पचेंडा कलां गांव के बचन सिंह हमेशा याद किए जाते रहेंगे। उन्होंने राष्ट्र रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनकी स्मृति में कचहरी के सामने बचन सिंह की मूर्ति लगाई गई है। प्रदेश सरकार ने पचेंडा रोड को बचन सिंह मार्ग भी घोषित किया है। एक सैनिक के नाते सरकार ने कई सुविधाएं परिवार को दीं। बचन सिंह के हेमंत और नीरज दो बेटे हैं। अपनी मां कामेश से प्रेरणा लेकर पिता बचन सिंह के सपनों को साकार करते हुए बेटा हेमंत सेना में कैप्टन बना है।
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बेलड़ा के लोग नहीं भूले अमरेश का बलिदान
भोपा क्षेत्र के गांव बेलड़ा के अमरेश पाल ने कारगिल में दुश्मन सैनिकों को मारते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया था। गांव के लोग उनकी शहादत को आज भी याद करते हैं। गांव में उनकी याद में एक जूनियर हाईस्कूल बनाया गया है। गांव में गेट, स्मारक का निर्माण, प्राधिकरण में दुकान देने की घोषणा हवाई साबित हुई हैं। अमरेशपाल की पत्नी उमाकांत अपनी बेटी गोल्डी और बेटे बंटी को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं। भाई नेत्रपाल का कहना है कि गांव में शहीद अमरीश पाल जूनियर हाईस्कूल में न तो बिजली है और न ही स्टाफ। शहीद की याद में की गई घोषणाओं की औपचारिकता पूरी की गई।
रिजवान देश के लिए अंतिम सांस तक लड़े
बुढ़ाना क्षेत्र के विज्ञाना गांव के जांबाज सपूत रिजवान त्यागी ने कारगिल में शहादत पाई थी। पाकिस्तान बॉर्डर पर तैनाती के दौरान वह चार माह की छुट्टी पर गांव आए थे। जैसे ही कारगिल में जंग छिड़ी, उनकी बटालियान को खालूबार शिखर पर तैनाती दे दी गई। कारगिल की पहाड़ियों पर दुश्मन ने धावा बोल दिया। दुश्मन के खिलाफ अदम्य साहस से युद्ध लड़ते हुए वह तीन जुलाई को शहीद हो गए। उस समय पत्नी शबनम बानो की गोद में चार साल की बेटी हिना थी। पति की शहादत के बाद जिंदगी में जुड़े अनेक सपने बिखर गए, मगर उन्होंने अपनी बेटी की परवरिश में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। हिना ने कस्बे के ही एक स्कूल से 12वी पास की। मेरठ कॉलेज से बीएससी तथा एमएससी उत्तीर्ण करने के बाद परिजनों ने उसका निकाह कर दिया है। हिना रिजवान कहती हैं कि शहीद पिता मुझे उच्च शिक्षा दिलवाना चाहते थे, जिसे परिवार ने पूरा किया।
इटावा के सपूत की रगों में था देशभक्ति का जज्बा
बुढ़ाना क्षेत्र के इटावा गांव के किसान का बेटा नरेंद्र राठी कारगिल युद्ध में ऑपरेशन विजय के दौरान काक्षर हिल पर दुश्मन के छक्के छुड़ाता हुआ देशभक्ति के जज्बे के साथ वीरगति को प्राप्त हो गया था। अप्रैल 1999 में एक माह की छुट्टी लेकर घर आया था, बाद में नरेंद्र राठी अपनी ड्यूटी पर वापस चला गया था। उसकी पोस्टिंग कारगिल की पहाड़ियों पर हो गई। कारगगिल युद्ध में ऑपरेशन विजय के दौरान दुश्मन के साथ लोहा लेता हुआ नरेंद्र राठी शहीद हो गया। वह अपने पीछे पत्नी अनीता देवी, पुत्र सुमित राठी तथा पुत्री सुरचना को छोड़ गया। पुत्र सुमित राठी बीटेक करने के बाद नोएडा की एक कंपनी में इंजीनियर है। उसकी शादी गांव जमालपुर निवासी निधि चौधरी के साथ हो गई थी। बेटी सुरचना ने दिल्ली से बीए करने के बाद अब मेरठ से बीएड की है। प्रतिवर्ष प्रतिमा स्थल पर यज्ञ होता है। सरकार ने शहादत के समय की सभी घोषणाएं पूरी की हैं। परिवार के लोग जब याद करते है तो आंखों में आंसू आ जाते हैं।
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सतीश की शहादत पर ग्रामीणों को गर्व
रतनपुरी क्षेत्र के गांव फुलत निवासी सतीश कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। उनकी शहादत पर गांववासियों को आज भी गर्व है। शहादत के समय फुलत गांव का नाम शहीद सतीश कुमार के नाम पर रखने, गांव का मुख्य द्वार बनाए जाने आदि जैसी कई घोषणा सरकार द्वारा की गई थीं, लेकिन इनमें से कोई घोषणा पूरी नहीं हुई। पिता धर्मपाल सिंह ने बताया कि समाधिस्थल के सामने सरकार की ओर करीब छह बीघा जमीन वाटिका हेतु आवंटित की गई थी, जो फिलहाल उपेक्षित पड़ी है। 2008 में सतीश की माता नत्थो देवी का भी स्वर्गवास गया। 26 जुलाई को परिजन फुलत स्थित शहीद फौजी सतीश की समाधि पर हवन करते हैं। सतीश कुमार की पत्नी विमलेश देवी अपनी दो बेटियों रूपाली और झलक तथा बेटे अतुल के साथ कंकरखेड़ा मेरठ स्थित मकान में रहती हैं। सरकार द्वारा दी गई गैस एजेंसी अनियमितताओं के चलते पहले ही निरस्त हो चुकी है। सरकार की ओर से मिलने वाली पेंशन से ही परिवार का भरण पोषण होता है। सतीश के नाम पर गांव में जूनियर हाईस्कूल स्कूल, दो कमरों का आवास, शहीद वाटिका निर्माण जैसी कई घोषणा की थीं, कोई पूरी नहीं हुईं।
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