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दुआ करें, फिर न घुले सौहार्द में नफरत का जहर

Wed, 07 Sep 2016 12:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
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तीन साल पूर्व नंगला मंदौड़ पंचायत में उमड़ी भीड़ (फाइल फोटो)। - फोटो : अमर उजाला
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आज ही के दिन सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर में हिंसा का ऐसा जलजला आया, जिसमें सदियों के हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को छिन्न-भिन्न कर दिया। दंगे में 65 से अधिक बेगुनाहों की उपद्रवियों ने जान ले ली। 50 हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए थे। हिंसा की आग ने वेस्ट यूपी के कई जिलों को अपनी चपेट में ले लिया था। कवाल में तिहरे हत्याकांड के बाद नंगला मंदौड़ और खालापार में हुई सभाओं ने आग में घी का काम किया। नफरत ने दिलों की ऐसी दूरियां बढ़ाई कि गांव छोड़ आए लोग आज तक वापस नहीं लौट पाए। दंगे के तीन साल बीतने पर एक रिपोर्ट।

नफरत के उन्माद में गांव और गलियों तक जो हिंसा फैली थी, ऐसा कभी यहां के इतिहास में नहीं देखा गया था। नंगला मंदौड़ में सात सितंबर को हुई महापंचायत के बाद शाम ढलते ही दंगा भड़क उठा था। बेगुनाहों की जिंदगी छीन ली गईं। हालात ऐसे बने कि जो जिस हालात में था, वैसे ही भागना पड़ा। केंद्र और प्रदेश सरकार ने मुआवजे का मरहम लगाया, लेकिन जख्म नहीं भर पाए।  जानसठ के कवाल में 27 अगस्त 2013 को शाहनवाज की हत्या के बाद भीड़ ने मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव को बेरहमी से मार डाला था। तिहरे हत्याकांड की वजह से अमन-चैन खतरे में पड़ गया।
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रही-सही कसर सियासत ने पूरी कर दी। 29 अगस्त को खालापार और फिर 31 अगस्त को नंगला मंदौड़ में पंचायतें र्हुइं, जिनमें भड़काऊ भाषण दिए गए। माहौल गर्माता गया और पुलिस प्रशासन कोई नियंत्रण नहीं कर पाया। इसी बीच 'बहू-बेटी बचाओ सम्मान’ के नाम से सात सितंबर को नंगला मंदौड़ में दूसरी पंचायत बुलाई गई। तत्कालीन डीजीपी देवराज नागर और आईजी ब्रजभूषण जिले में डेरा डाल लिया। धारा 144 और तमाम बंदिशों के बावजूद हजारों की भीड़ नंगला मंदौड़ पहुंच गई। सुबह से ही जिले का माहौल तनावपूर्ण हो गया। पंचायत में जाते ग्रामीणों के साथ बसीकलां में दूसरे संप्रदाय के लोगों से नोकझोंक हो गई।

पंचायत में यह मामला उठा। शाम ढलते-ढलते जिले में हिंसा का दौर शुरू हो गया। पंचायत से लौटती भीड़ पर मीरापुर के मुझेड़ा, पुरबालियान और जौली गंगनहर पर सुनियोजित तरीके से हमले हुए। इन हमलों में 12 लोग मारे गए थे। कई लोग लापता हो गए, जिनकी बाद में नहरों और रजवाहों से लाशें बरामद हुईं। हमले के प्रतिशोध में शाहपुर, बुढ़ाना, फुगाना, भौराकलां, तितावी, भोपा थाना क्षेत्रों में हिंसा का नंगा नाच हुआ।

मुजफ्फरनगर और शामली के 65 से ज्यादा लोग हिंसा का शिकार हुए। 50 हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए, जिन्होंने शरणार्थी कैंपों में शरण ली। केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार और सूबे की सपा सरकार ने मुआवजे का मरहम लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, मगर दिलों के बीच पैदा हुई दरार आज तक नहीं भर पाई है। हालांकि जिंदगी पटरी पर है। सब अपने काम-धंधों में जुटे हैं, लेकिन अभी भी चाहे गांव हों या शहर, दंगे को लेकर दोनों संप्रदायों के अपने-अपने तर्क और मत हैं। गुनहगार कौन था, नफरत किसने फैलाई। यह सब अदालती कार्यवाही में तय हो रहा है।

दंगे पर गठित एसआईटी हिंसा के सभी मामलों में अपनी तफ्तीश पूरी कर चुकी है। कुछ आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। कुछ मामले हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं। कानूनी पेचीदगियों में फंसी न्याय की लड़ाई के बीच अभी भी सौहार्द और भाईचारे का संकट है। दंगे में जो लोग गांव छोड़ गए, वह आज तक वापस नहीं आए। उन्होंने नई बस्तियों में आशियाने बना लिए और कुछ दूसरे शहरों का रुख कर गए। तीन साल के बाद सामाजिक तौर पर सांप्रदायिक सौहार्द की पहल हुई है, अब छोटे-छोटे विवाद तूल नहीं पकड़ते। मौअज्जिज और अनपसंद लोगों की वजह से टूटे रिश्तों को जोड़ने की कवायद हो रही है।  
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क्या है गैंगरेप का सच?
दंगे के दौरान महिलाओं से गैंगरेप की सच्चाई अभी तक सामने नहीं आ सकी है। फुगाना थाने में सात महिलाओं ने ऐसे मुकदमे दर्ज कराए थे। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद एसआईटी ने सभी मामलों की जांच पूरी कर कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी है। सच क्या है, यह फैसला अदालत को करना है। हालांकि आरोपी लगातार यह कहते रहे हैं कि दंगे के 20 दिन बाद षड्यंत्र के तहत उनके खिलाफ गैंगरेप के मुकदमे दर्ज किए गए, जबकि एसआईटी के पास कोई सुबूत नहीं है। सिर्फ 164 के बयान के आधार पर उन्हें दोषी बना दिया गया। 
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