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सियासत ने सुलगाई थी चिंगारी

Fri, 25 Sep 2015 12:28 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
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मुजफ्फरनगर। कवाल के तिहरे हत्याकांड के बाद ऐसा सियासी खेल शुरू हुआ, जिसकी गहराई प्रशासन भांप नहीं पाया। खालापार में जुमे की नमाज के बाद हुई मुसलिमों की सभा में डीएम और एसएसपी के पहुंचने पर तीखी प्रतिक्रिया हुई, जिसकी वजह से नंगला मंदौड़ में हजारों की भीड़ जुट गई।
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मलिकपुरा के ममेरे भाइयों को श्रद्धांजलि देने के लिए सियासी अलंबरदारों ने 31 अगस्त 2013 को नंगला मंदौड़ में पंचायत का ऐलान कर दिया। हालांकि डीएम से वार्ता के बाद भाकियू ने कदम वापस खींच लिए थे, लेकिन भीड़ नहीं रुक पाई। पंचायत शुरू हुई तो पूरा नेतृत्व भाजपाइयों ने थाम लिया।

 जैसे-तैसे पुलिस प्रशासन ने उस पंचायत को तितर-बितर कराया। मामला शांत करने की कोई कोशिश किसी भी तरफ से नहीं हुई, क्योंकि पंचायत के ऐलान के बाद मुसलिम नेताओं ने खालापार में जुमे की नमाज के बाद सभा की, जिसमें डीएम कौशलराज शर्मा और एसएसपी सुभाषचंद्र दुबे भी ज्ञापन लेने पहुंच गए। प्रशासन के इस कदम की तीखी प्रतिक्रिया हुई। दोनों समुदाय की ओर से शक्ति प्रदर्शन शुरू हो गए।
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पहली पंचायत में हुई किरकिरी के बाद भाकियू ने सात सितंबर 2013 की पंचायत की कमान अपने हाथों में ले ली। तब तक जिले के शहर से लेकर देहात तक कवाल का बवाल अंदरूनी तौर पर सुलग चुका था। हर निगाह सात सितंबर पर टिकी थी, सुबह जैसे ही ट्रैक्टर ट्रॉलियां पंचायत में पहुंचने लगीं तभी माहौल गरमा गया। शाहपुर के बसी कलां में पंचायत से लौटते ग्रामीणों पर हमले के मामले से गुस्सा भड़क गया।

घायल पंचायत के बीच पहुंच गए और माहौल अराजक हो गया। पुलिस प्रशासन के हाथ में कुछ भी नहीं रहा। सांझ ढलते-ढलते पंचायत से लौटते ग्रामीणों पर जौली गंगनहर, सिखेड़ा, पुरबालियान में एक साथ हमले हुए और दंगा भड़क गया। जस्टिस सहाय आयोग के पास पंचायतों के भाषणों और वीडियो के पुख्ता प्रमाण हैं। दो साल तक चली जांच के बाद हर पहलू को गंभीरता से लिया गया है। दोषी पाए गए सियासदा के खिलाफ कार्रवाई में यह भी अहम सुबूत बन गए हैं।
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