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कार्रवाई के लपेटे में सियासत और ब्यूरोक्रेसी

Fri, 25 Sep 2015 12:31 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
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मुजफ्फरनगर। दो साल पहले सात सितंबर को मुजफ्फरनगर में हुए दंगे की न्यायिक जांच रिपोर्ट से सियासत और ब्यूरोक्रेसी में हलचल मची हुई है। जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की गवर्नर रामनईक को सौंपी गई रिपोर्ट का अभी तक सार्वजनिक खुलासा तो नहीं हो पाया है, लेकिन माना जा रहा है कि कई राजनीतिज्ञों और बड़े अफसरों का फंसना तय है।
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मुजफ्फरनगर दंगे की न्यायिक जांच रिपोर्ट जस्टिस विष्णु सहाय आयोग ने बुधवार को सूबे के राज्यपाल रामनईक को सौंपी थी। 775 पन्नों में छह खंडों में तैयार की गई रिपोर्ट का निष्कर्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने 25 पन्नों में लिख दिया है। रिपोर्ट में क्या है, किन्हें दोषी ठहराया गया है,

ऐसे ही अनगिनत सवालों को लेकर वेस्ट की सियासत और ब्यूरोक्रेसी में हलचल मची हुई है। सात सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ की पंचायत के बाद भड़की हिंसा में मुजफ्फरनगर और शामली में 62 से ज्यादा बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया गया था, जबकि 50 हजार से ज्यादा बेघर हो गए थे।
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दंगे का मुजरिम कौन है, यह खुलासा जस्टिस विष्णु सहाय की रिपोर्ट में होना है। दंगा न केवल अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बना था, बल्कि लोकसभा चुनाव से पहले देश की सियासी पार्टियों में दंगे को लेकर बवाल मच गया था। खुद तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और सीएम अखिलेश यादव को मुजफ्फरनगर आना पड़ा था।

हालांकि अखिलेश सरकार ने डैमेज कंट्रोल करने के लिए पूरी मशीनरी झोंक दी थी, लेकिन हिंसा और साइलेंट वार में वारदातें होती रहीं। जस्टिस सहाय आयोग ने जिले में कैंप कार्यालय बनाकर दंगा पीड़ितों के लिखित बयान दर्ज किए थे। पूरी प्रक्रिया में 375 लोगों के बयान लिए गए।

 पूरी अवधि में सहारनपुर और मेरठ मंडल में तैनात रहे 101 अफसरों को भी आयोग के समक्ष पेश होना पड़ा था। गवर्नर को दी गई रिपोर्ट में माना जा रहा है कि सियासत और ब्यूरोक्रेसी के कई चेहरे लपेटे में आ सकते हैं। कवाल में तिहरे हत्याकांड के बाद जिस तरह सियासी दलों ने मामले की पैरवी की और भड़काऊ बयानबाजी की, उससे टकराव बढ़ता गया।

मलिकपुरा के दो ममेरे भाइयों गौरव और सचिन तथा कवाल के शाहनवाज की मौत के बाद हिरासत में लिए गए आरोपियों को छोड़ दिए जाने पर मामले ने तूल पकड़ लिया। घटना की रात ही डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी का तबादला करने से भी हालात बिगड़े।

आयोग ने यह भी संज्ञान लिया था कि 31 अगस्त को नंगला मंदौड़ में पंचायत किन नेताओं ने आहूत की थी। किस-किस पार्टी के नुमाइंदे मंच संभाले हुए थे। जब एक पंचायत हो गई तो फिर सात सितंबर की पंचायत किस मकसद को हासिल करने के लिए बुलाई गई।

यानी साफ था कि सियासी फायदे की लड़ाई छिड़ चुकी थी। अलग-अलग पार्टियों के सफेदपोशों ने दोनों समुदायों में बिखराव, तनाव और नफरत पैदा कर दी। हालांकि दंगे से सियासी फायदा उठाकर कई नेता फर्श से अर्श पर पहुंच गए और अफसरों ने ट्रांसफर करा लिए।

फिलहाल जिले में दंगे के दौरान का कोई अधिकारी तैनात नहीं है। एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे को निलंबन तक झेलना पड़ा था। विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो अफसरों से लेकर नेताओं को कार्रवाई के लपेटे में आने का डर सता रहा है।
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