आखिर किस काम का है खुफिया तंत्र
मुजफ्फरनगर। अंसार उल बांग्ला टीम का आतंकी अब्दुल्ला शहर में रहने के साथ गांव-देहात में खुलेआम घूमता रहा, लेकिन खुफिया तंत्र के साथ ही पुलिस को भी उसकी भनक नहीं लगी। ऐसे में खुफिया तंत्र की नाकामी और पुलिस की लापरवाही भी उजागर हो रही है। सबसे बड़ी पहेली यह है कि वर्ष 2013 में जिले में उन्माद की चिंगारी भड़की थी, ऐसे में अब्दुल्ला कहां रहा और दंगे में किस-किस के संपर्क में था। इन सवालों की भी आला अफसर तस्दीक करने में लगे हैं।
बांग्लादेश में बैठे आकाओं से आतंकी अब्दुल्ला का लगातार संपर्क बना हुआ था। उसकी गिरफ्तारी के बाद जिले में उसके जगह-जगह रहने के राज से पर्दा उठ रहा है। शहर में खुफिया एजेंसियां एलआईयू, स्पेशल इंटेलीजेंस, आईबी समेत पुलिस का मजबूत तंत्र धरा रह गया। आतंकी के शहर में रहने और घूमने की किसी को भनक तक नहीं लग सकी। एटीएस ने अब्दुल्ला के चेहरे से शराफत का नकाब हटाने के साथ ही पुलिस और खुफिया तंत्र की लापरवाही भी उजागर कर दी। सरवट के मदरसे में आतंकी ने मासूमियत चेहरा दिखाकर दाखिला लिया, जबकि इसी मदरसे से करीब 600 मीटर की दूरी पर सरवट पुलिस चौकी है, लेकिन पुलिस ने कभी जांच-पड़ताल की जहमत नहीं उठाई है। उधर, खुफिया स्तर पर जिम्मेदारी निभाने वाली एलआयू, स्पेशल इंटेलीजेंस और आईबी शहर में धरने-प्रदर्शन और मामूली कार्यक्रमों की जानकारी जुटाने में ही ड्यूटी की इतिश्री कर रहे हैं। अब सवाल है कि आतंकी अब्दुल्ला मुजफ्फरनगर में दंगे भड़कने से एक साल पहले पहुंच गया था। सरवट से अब्दुल्ला 19 जून 2013 को चला गया था, लेकिन इसके बाद वह कहां रहा और क्या-क्या काम करता रहा, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है।
जिले में सात सितंबर 2013 को हिंसा भड़की थी, जबकि एटीएस उसके मुजफ्फरनगर, देवबंद, सहारनपुर में रहने की अवधि को वर्ष 2011 से 2017 तक मान रही है। अब सवाल है कि दंगे के दौरान अब्दुल्ला कहां था। वह किसी क्षेत्र, गांव या स्थान की रेकी तो नहीं कर रहा था। जिले और आसपास रहकर वह लगातार अपने आकाओं को यहां से इनपुट भेजता रहा। वहीं, पूर्व में पकड़े गए आतंकियों से अब्दुल्ला का कोई संपर्क तो नहीं हुआ है, यह भी गहन जांच का विषय है। साथ ही सरवट या कुटेसरा में रहते हुए कोई युवक, महिला या अन्य आतंकी से उसका संपर्क रहा है। इसकी छानबीन भी एटीएस के अफसर कर रहे हैं।