मुजफ्फरनगर। गन्ने की फसल में पोक्का बोइंग और टॉप बोरर बीमारियों ने किसानों की चिंता बढ़ानी शुरू कर दी है। जुलाई के बाद अब तक अगस्त माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार गन्ने का उत्पादन पांच फीसदी तक गिरने की संभावना है।
मौसम ने इस बार किसानों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। पहले गेहूं की फसल का उत्पादन अप्रत्याशित तरीके से प्रभावित हुआ, अब गन्ने की फसल पर भी खतरा मंडराने लगा है। गन्ना शोध संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. वीरेश कुमार बताते हैं कि पोक्का बोइंग और टॉप बोरर से फसल प्रभावित हुई है, इससे उत्पादन पर असर पड़ेगा। इसके अलावा समय पर बारिश नहीं होने के कारण भी फसल की बढ़वार प्रभावित हो गई है। जिले के प्रत्येक ब्लॉक में फसल में बीमारियां देखने को मिल रही है।
0238 ने बिगाड़ा नई प्रजातियों का गणित
गन्ने की प्रजाति 0238 में बीमारी के सबसे अधिक मामले हैं। कुछ किसानों ने 0238 के आसपास के खेतों में नई किस्म 13235, 14201 और 15023 की बुआई की है। ऐसे में नई किस्म भी बीमारियों की चपेट में आनी शुरू हो गई है।
इस तरह अगस्त में हुई बरसात
साल बारिश/मिमी
2022 68.4 (अब तक)
2021 151.6
2020 240.0
2019 402.8
2018 233.2
2017 270.8
2016 187.8
2015 140.0
2014 107.4
2013 451.5
2012 309.2
2011 312.8
2010 130.2
इस तरह बढ़ा गन्ने का रकबा
जिले में इस बार गन्ने का क्षेत्रफल 3828 हेक्टेयर बढ़ गया है। दो लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। लगभग 85 प्रतिशत जमीन पर किसान गन्ने की खेती कर रहे हैं। गन्ने का रकबा एक लाख 71 हजार 843 हेक्टेयर पर पहुंच गया है। पिछले साल जिले में एक लाख 68 हजार 15 हेक्टेयर में गन्ने की खेती हुई थी। जिले में 2018-19 में गन्ने का क्षेत्रफल एक लाख 39 हजार 221 हेक्टेयर था।
लाइट ट्रैप का प्रयोग करें किसान
त्रिवेणी शुगर मिल खतौली के वीसी अशोक कुमार, गन्ना महाप्रबंधक कुलदीप राठी का कहना है कि किसान कीटों के प्रकोप से फसल को बचाने के लिए लाइट ट्रैप का प्रयोग कर सकते हैं। रात के समय फसल के पास लाइट जलाएं, जिससे कीट खेतों में न जाकर लाइट के पास इकट्ठे होंगे और मर जाएंगे।
पोक्का बोइंग पहुंचा रहा नुकसान
कृषि विज्ञान केंद्र बघरा के प्रभारी डॉ. अनिल कटियार का कहना है कि इस बार पोक्का बोइंग फसल को नुकसान पहुंचा रहा है। बारिश नहीं होने के कारण तापमान अधिक बना हुआ है, जिससे इस बीमारी का प्रकोप बढ़ गया है। किसान कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से दवाइयों का छिड़काव कर सकते हैं।