मुरादाबाद। रघुकुल रीत सदा चली आई। प्राण जाए पर वचन न जाई। कटघर के डिप्टी जगन्नाथ मंदिर में चल रही श्रीराम कथा के सातवें दिन श्रीराम के वनगमन व कवट प्रसंग का वर्णन किया गया। कथा व्यास अतुल कृष्ण जी भारद्वाज महाराज ने श्रोताओं से कहा कि भरत और केवट से त्याग व भक्ति की प्रेरणा लेनी चाहिए।
राम और भरत ने संपत्ति का बंटवारा नहीं किया बल्कि विपत्ति का बंटवारा किया। राजा दशरथ ने कैकई को वचन तो दे दिया पर उसके वाद वे निशब्द होकर रह गए। रघुकुल की मर्यादा के लिए उन्होंने अपने प्रिय पुत्र का वियोग स्वीकार कर लिया। कथा व्यास ने कहा कि कुसंगति को हानिकारक बताया गया है। मन्थरा दासी की कुसंगति के कारण ही कैकई की मति मारी गई और उसने राम के राज्याभिषेक से ठीक पहले उनके लिए वनवास मांग लिया। श्रीराम ने पिता के वचन का मान व कुल की मर्यादा रखने के लिए इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया और वन को प्रस्थान किया।
वनगमन के दौरान रास्ते में केवट ने श्रद्धा भाव से भगवान राम के पैर धोए थे। साथ ही उन्हें गंगा पार कराई। बदले में केवट ने उनसे भवसागर पार कराने का वरदान मांग लिया। भगवान के चरण दोकर केवट की पीढ़ियां तर गईं। कथा में मुख्य अतिथि ट्रस्ट अध्यक्ष शिव कुमार, उमेश पाल, सर्वेश सिंह, गोपाल मिश्रा, नीरज गुप्ता, सुनील कुमार, देवेश सिंह, राजेश (रम्मू), राजेश सूर्य, रामवीर सिंह, मंगल सेन शर्मा, विपिन गुप्ता, कुलदीप नारायण, बृजेश सिंह, अरविंद सिंह आदि मौजूदरहे।