इसके बाद सुबह गांव के पास एक पर्ची मिली थी। इस पर लिखा था कि बच्चे को जिंदा चाहते हो तो अपने परिवार के पढ़े लिखे लड़के को मुरादाबाद लखनऊ हाईवे पर दो लाख रुपये लेकर भेज देना। पुलिस से शिकायत करने पर बच्चे को मारने की धमकी भी दी गई थी। उस वक्त गौरव 12वीं कक्षा में पढ़ रहा था। महेंद्र और गांव के अन्य लोगों को गौरव पर शक हुआ।
उससे कड़ाई से पूछताछ की गई। तब उसने बताया कि 27 जनवरी को उसने मनमोहन की गला दबा कर हत्या कर दी थी। उसने लाश गांव के पास मोहम्मद उमर के गन्ने के खेत में दबा दी थी। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर उसकी निशानदेही पर गन्ने के खेत से लाश बरामद की थी।
इस मामले की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश संख्या छह रणजीत कुमार की अदालत में हुई। वादी की ओर से अधिवक्ता रजत शर्मा एवं सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता नीलम वर्मा ने पक्ष रखा। 11 गवाहों ने अदालत में बयान दर्ज कराए। बचाव पक्ष का तर्क था कि गौरव को रंजिश के चलते झूठा फंसाया गया है। अदालत ने दोनों पक्षों सुनने के बाद गौरव को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
लालच और परिवार के दबाव में नहीं आया पिता
महेंद्र पर परिवार और रिश्तेदारों ने समझौते के लिए बहुत दबाव बनाया। पैसे का लालच भी दिया गया लेकिन महेंद्र नहीं माना। उसने कोर्ट में बेटे को इंसाफ दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी। नौ साल आठ बाद फैसला आया तो पिता की आंखों से आंसू छलक आए। महेंद्र बोला कि मुझे और मेरे बेटे को आज न्याय मिला है।
छोटे बेटे का नाम रख लिया मनमोहन
महेंद्र सिंह ने बताया कि उसके परिवार में पत्नी कैलाशो, बेटी, रचना, संतोष, मनू, ज्योति और छोटे बेटे का नाम यश है। मनमोहन की हत्या के वक्त उसकी उम्र आठ साल थी जबकि यश की उम्र दो साल थी। अब यश का नाम उन्होंने मनमोहन रख लिया है।