फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Deadman Alive : फिल्म ‘कागज’ की तरह जिंदा होने का सबूत लेकर दौड़ रहे हैं मुरादाबाद के ‘डेडमैन’  

Fri, 01 Jul 2022 04:23 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, मुरादाबाद

सार

एक महिला ने अब्दुल रफीक को मृत पति बताकर जमीन करा ली अपने नाम। सिस्टम की ढिलाई से रजिस्ट्री कराने में कामयाब हो गए महिला और उसके साथी।
विज्ञापन
फिल्म कागज का दृश्य - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

फिल्म ‘कागज’ में जिस तरह सिस्टम की कमजोरियों व भ्रष्ट कर्मचारियों के कारण अभिनेता पंकज त्रिपाठी को मृत दिखाकर उनकी जमीन किसी और ने अपने नाम करा ली थी, वैसे ही मुरादाबाद में भी एक ‘डेडमैन’ सामने आए हैं। एक महिला ने उन्हें अपना मृत पति बताकर जमीन अपने नाम करा ली। महिला और उसका साथी उनकी 24 साल पहले मौत हो जाने का हवाला देकर जमीन (भूखंड) की रजिस्ट्री कराने में कामयाब हो गए। मुरादाबादी ‘डेडमैन’ जिंदा होने के सुबूत के तौर पर खुद को जगह-जगह पेश करते फिर रहे हैं।  

विज्ञापन


फिल्मों जैसी लगने वाली यह कहानी कपूर कंपनी तिराहे से सटे हैलेट रोड निवासी अब्दुल रफीक खां की है। वे पेशे से घड़ी मैकेनिक हैं। अब्दुल रफीक ने बताया कि 17 नवंबर 1998 में मुरादाबाद विकास प्राधिकरण(एमडीए) की ट्रांसपोर्टर नगर योजना श्रेणी डी में 7.50 वर्गमीटर क्षेत्रफल के भूखंड का आवंटन उनके नाम पर हुआ था। इसके बाद से वह लगातार केनरा बैंक की शाखा में किस्तें जमा करके भूखंड की कीमत अदा कर रहे हैं। नौ मार्च 2009 में उसने अंतिम किस्त जमा की थी। इसके बाद वह आर्थिक परेशानी से भूखंड की रजिस्ट्री अपने नाम नहीं करा सके थे।

वर्ष 2021 में उन्होंने एमडीए दफ्तर में प्रार्थनापत्र दिया कि अब भूखंड की रजिस्ट्री उनके नाम पर कर दी जाए। कर्मचारियों ने कागजात की जांच की तो पता चला कि यह भूखंड 15 जुलाई 2010 में ही उनकी पत्नी के नाम पर हो चुका है। इस काम को कराने के लिए उनकी कथित पत्नी की ओर से नगर निगम द्वारा जारी मृत्यु प्रमाणपत्र दाखिल किया गया था। 
विज्ञापन


अब्दुल रफीक की पत्नी बनकर अपने नाम रजिस्ट्री कराने वाली पीरजादा निवासी महिला ने दो अन्य गवाहों के भी प्रमाणपत्र दाखिल किए थे। कागजों में दर्शाया गया था कि अब्दुल रफीक की मृत्यु 21 अगस्त 1998 को पीरजादा स्थित उनके घर पर हुई थी। नगर निगम की ओर से 26 अगस्त 1998 को मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किया गया था। 

अब्दुल रफीक का कहना है कि उन्होंने इस मामले की शिकायत नगर निगम और एमडीए के अधिकारियों से की। जिंदा होने के सुबूत के तौर पर अफसरों के आगे खुद को पेश किया लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। हार कर एसएसपी कार्यालय में प्रार्थनापत्र देकर न्याय की गुहार लगाई है। एसएसपी ने सीओ सिविल लाइंस आशुतोष तिवारी को मामले की जांच सौंपी है।  

ग्याह साल तक पाई पाई जोड़ अदा कीं किस्तें
अब्दुल रफीक ने बताया कि उन्हें एमडीए की ओर से  17 नवंबर 1998 में भूखंड आवंटित किया गया था। इसके बाद से वह लगातार किस्तें जमा करते रहे। उन्होंने ग्यारह साल तक एक एक पाई जोड़कर किस्तें जमा की हैं। 

मौत के तीन माह बाद कैसे आवंटित हो सकता है भूखंड 
अब्दुल रफीक खां का इस बात से हैरान हैं कि फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र कैसे जारी हो गया और एमडीए व रजिस्ट्री दफ्तर में फर्जी कागजों की धरपकड़ क्यों नहीं हो सकी। उनका सवाल है कि उनकी मृत्यु 21 अगस्त 1998 में दर्शायी गई है, जबकि एमडीए से 17 नवंबर 1998 को उन्हें भूखंड आवंटित हुआ था। यह भी नहीं देखा गया कि उनकी मौत के करीब तीन माह बाद उनके नाम भूखंड कैसे आवंटित हो सकता है।

कोरोना से पिता का हो गया था इंतकाल
अब्दुल रफीक कहना है कि पहले इस मामले में 2021 में एमडीए में शिकायत की थी। कोरोना के चलते उनके पिता का इंतकाल हो गया था। इसके बाद वह पैरवी नहीं कर पाए। अब दोबारा 2022 में पैरवी शुरू की है।

चार सदस्यों का है परिवार
मुरादाबाद। अब्दुल रफीक ने बताया कि 2001 में शारदा परवीन से उनकी शादी हुई थी। एक बेटा अरिफ (17) और एक बेटी सामिया (12) है। बताया कि वह घड़ियों की मरम्मत का काम करके अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। 

एक व्यक्ति ने प्रार्थनापत्र दिया है, जिसमें उसने बताया कि उसे कागजों में मृत दर्शाकर उसका भूखंड एक महिला ने अपने नाम करा लिया है। इस मामले की जांच की जा रही है। वादी के बयान दर्ज किए गए हैं। दूसरे पक्ष को बयान दर्ज करने के लिए बुलाया गया है। 
-आशुतोष तिवारी, सीओ सिविल लाइंस

मैं जीवित हूं। एक महिला ने खुद को मेरी पत्नी बताकर मेरा फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाकर मेरा भूखंड अपने नाम करा लिया है। इसमें एमडीए और नगर निगम के अधिकारी व कर्मचारियों की मिलीभगत रही है। मैंने इस मामले में पुलिस से शिकायत कर न्याय की गुहार लगाई है।
-अब्दुल रफीक खां, पीड़ित व्यक्ति

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें