करीब 26 वर्ष पहले धनौरा में आतंकी घटना में शहीद हुए एसआई मेवाराम मिश्रा की बेटियों ने बुधवार को आए अदालत के फैसले पर खुशी जताई पर साथ ही चेहरे पर दर्द भी उभर आया। बोलीं, आतंकियों को फांसी होती तो दिल को सुकून मिलता। मेवाराम मिश्रा के बेटा भी पुलिस में एसआई थे और एक मुठभेड़ में वो भी शहीद हो गए थे।
शाहजहांपुर जनपद के मीरानपुर कटरा थानाक्षेत्र के खिरिया सकटू गांव निवासी मेवाराम मिश्रा उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा के पद पर तैनात थे। उनकी तैनाती अमरोहा के धनौरा में थी। 9 अक्तूबर 1991 में खालिस्तानी आतंकी संगठन ने पुलिस टीम पर हमला कर दिया था। जिसमें दरोगा मेवाराम मिश्रा शहीद हो गए थे।
शहीद मेवाराम मिश्रा के परिवार में पत्नी मोहनी मिश्रा, बेटियां पुष्पा मिश्रा, सुनीता मिश्रा, अनीता मिश्रा और बीना मिश्रा व एक बेटा विनोद कुमार मिश्रा थे। करीब 26 साल बाद बुधवार को इस मामले में अदालत ने फैसला सुनाया है। पुलिस पार्टी को मारने वालों को उम्रकैद की सजा हुई है। शहीद मेवाराम की पत्नी मोहिनी मिश्रा की छह माह पहले मौत हो चुकी है।
उनकी दो बेटियां पुष्पा मिश्रा और अनीता सिविल लाइंस के दीनदयाल नगर में रहती हैं। पुष्पा और अनीता ने बताया कि वह अदालत के फैसले का स्वागत करती हैं। लेकिन इस फैसले को आने में बहुत देर हो गई। इन आतंकियों को उम्रकैद की सजा नहीं, बल्कि फांसी पर लटका देना चाहिए था।
बोली, जिन आतंकवादियों ने हमारे सिर से पिता का साया छीन लिया। उन्हें 25 साल बाद भी उम्रकैद की सजा हुई है। कम सेे कम फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी। बेटियां बोली है कि मां आतंकियों को फांसी पर लटका देखना चाहती थीं। लेकिन फैसला इतनी देर से आया कि वह उसे देखने के लिए आज दुनिया में नहीं हैं।
26 साल बाद ही सही इंसाफ तो मिला
धनौरा में 26 साल पहले हुई आतंकी घटना में चार पुलिस वालों के साथ ही कांठ का एक मैटाडोर चालक मेजर भी मारा गया था। बुधवार को जब अदालत ने दोषियों को सजा सुनाई तो कांठ में मेजर के घर वालों के आंसू छलक आए। बस इतना बोल सके, देर से ही सही इंसाफ तो मिला।
कांठ के मोहल्ला पट्टीवाला (पूर्वी रियासत) निवासी मेजर पुत्र वशीर 1990 के करीब अपनी ससुराल में धनौरा जाकर रहने लगा था। मेजर वहां प्राइवेट वाहन पर चालक की नौकरी करता था। 1991 में हुई वारदात में पुलिस पार्टी के साथ ही हमलावरों ने मेजर की भी गोली मारकर हत्या कर दी थी।
पुलिस जिस मैटाडोर से गश्त कर रही थी मेजर उसका चालक था। सरकार की ओर से परिजनों को महज बीस हजार रुपये की आर्थिक मदद मिली थी। मेजर की मां जोरा और भाई लियाकत की बीमारी से मौत हो गई। एक भाई शहादत मजदूरी करने दिल्ली चला गया। पत्नी राबिया कभी कांठ तो कभी अपने मायके धनौरा में रहती है।
ताऊ शहादत ने मेजर के बेटे सुलेमान और बेटी राबिया की परवरिश की। राबिया का विवाह दिल्ली के खजूरी इलाके में कर दिया जबकि सुलेमान हाई स्कूल का छात्र है। बुधवार को फैसला आया तो घर पर मेजर को बेटे की तरह पालने वाले कल्लन और भतीजा साजिद थे।
दोषियों को सजा की बात सुनकर वृद्ध कल्लन के चेहरे पर एक बार को चमक आई। वह बोले चलो 25 साल बाद ही सही न्याय तो मिला। मेरे बेगुनाह बेटे की जान इन हत्यारों ने ले ली थी। कल्लन मेजर के सौतेले पिता हैं। मेजर के पिता की मौत उसके बचपन में ही हो गई थी जिसके बाद उसकी मां की दूसरी शादी परिजनों ने कर दी थी।