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तटबंध की जमीन निगल गए प्रापर्टी डीलर

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मुरादाबाद।
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शहर को बाढ़ से बचाने के लिए तैयार किया गया रामगंगा तटबंध का खाका वजूद में आने से पहले ही दम तोड़ गया है। जिस जमीन पर तटबंध का निर्माण होना था उसके करीब आधे हिस्से को छुटभैय्ये प्रापर्टी डीलरों ने बेचकर रामगंगा के भीतर टाट टप्पर कालोनियों बसा दी हैं। जिन हाकिमों पर इस जमीन की निगहबानी का जिम्मा था वो आंखें मूंदकर कब्जों का तमाशा देखते रहे। बंधे के लिए आरक्षित जिस जमीन की खरीद फरोख्त और नक्शे पास होने पर पाबंदी थी, वो खरीदी - बेची भी गई और उस पर खुलेआम निर्माण भी होते रहे। जिला प्रशासन, एमडीए, नगर निगम और सिंचाई विभाग के किसी अफसर ने इस खेल को रोकने की कोशिश नहीं की। बाढ़ आई तो फिर से बंधे की फाइलों से अफसर धूल झाड़ रहे हैं। अवैध कब्जों से ध्यान हटाने के लिए नए सिरे से भूमि आरक्षित करने का शिगूफा छेड़ा गया है।
करीब तीन साल पहले तत्कालीन कमिश्नर सुधीर गर्ग की अध्यक्षता में हुई एमडीए बोर्ड की बैठक में विवेकानंद से लेकर मछरिया तक रामगंगा किनारे 12 किमी लंबे तटबंध का नक्शा पास हो चुका है। इस बैठक में सिंचाई विभाग, निगम और दूसरे संबंधित विभागों के अफसर भी मौजूद थे। तटबंध के लिए विवेकानंद से मछरिया तक कुल 12 गांवों में भूमि आरक्षित कर दी गई थी। तटबंध का अलाइनमेंट तय करने के बाद सिजरा नंबर तक तय कर दिए गए थे कि तटबंध किस गांव में किस सिजरा नंबर से होकर गुजरेगा। इसकी चौड़ाई 60 मीटर रखी गई थी। 10 मीटर भूमि नाले के लिए, उसके बाद 25 मीटर चौड़ाई में तटबंध और 25 मीटर चौड़ाई में ग्रीन बेल्ट के लिए भूमि आरक्षित की गई थी। बंधे का अलाइनमेंट बोर्ड से पास होने के बाद उसे शासन को भेज दिया गया था। बोर्ड में फैसला हुआ था कि तटबंध के लिए आरक्षित की गई सभी 12 गांवों की भूमि को न तो खरीदा - बेचा जाएगा और न ही उस पर कोई निर्माण होगा। इन पाबंदियों के बाद भी बंधे की भूमि को छुटभैय्ये प्रापर्टी डीलरों ने सरकारी तंत्र और नेताओं से मिलकर बेच डाला। विवेकानंद से जिगर कालोनी तक के हिस्से को छोड़ दें तो उसके आगे तटबंध की पूरी भूमि पर अवैध निर्माण हो चुके हैं। जिगर कालोनी से नवाबपुरा, दसवां घाट, काली मंदिर, जामा मस्जिद और आगे कटघर रेलवे पुल तक तटबंध के लिए आरक्षित की गई भूमि पर छोटी - छोटी अवैध बस्तियां बस चुकी हैं। इन अवैध निर्माणों को तोड़ना तो दूर यहां रामगंगा की धार में लगातार हो रहे नए अवैध निर्माणों को रोकने में भी प्रशासन नाकाम साबित हो रहा है।
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शहर के बाढ़ से घिरने के बाद एक बार फिर से अफसरों ने नया सुर छेड़ा है। अब तटबंध के लिए भूमि आरक्षित करने की बात कही जा रही है। नियम कहता है कि एक बार बोर्ड से पास हो चुके प्रस्ताव और एलाइनमेंट में कोई बदलाव नहीं हो सकता। पहले से तय अलाइनमेंट की भूमि को खाली कराने में नाकाम प्रशासन पब्लिक को भूमि आरक्षित करने का झुनझुना थमा रहा है। नियमों के तहत ये मुमकिन नहीं है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद फिर बंधे की फाइल रिकार्ड रूम में धूल फांकेगी।
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