चक रोड पर भागना शुरू किया था
बड़े भाई को देखकर गांव के चक रोड पर मैंने दौड़ना शुरू किया। धीरे-धीरे गांव के तमाम लड़के साथ दौड़ने लगे। वहां से बैलगाड़ी गुजरती थी तो रास्ता खराब हो जाता था। सब लड़के मिलकर ट्रैक को ठीक करते थे। इसी अभ्यास के बल पर मैंने 2010 और 2011 में नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में पदक जीता। 2013 में रेलवे में नौकरी मिल गई। इसके बाद भी कई साल तक चक रोड पर दौड़ते रहे। 2019 की शुरुआत में ही गांव के लोगों से बातचीत कर चक रोड के आसपास उनके 20 बीघा खेतों को किराये पर ले लिया। वहां स्पोर्ट्स के लिए सुविधाएं विकसित कीं। अब लोग इसे गांव के स्टेडियम के नाम से पहचानने लगे हैं। -अजीम पाशा, स्पोर्ट्समैन
गांव के मैदान पर अभ्यास करके मैंने 11.28 सेकंड में 100 मीटर रेस लगाकर नॉर्दर्न जोन नेशनल चैंपियनशिप में पहला स्थान पाया था। इसके लिए मुझे गोल्ड मेडल मिला था। यह प्रतियोगिता देहरादून में आयोजित हुई थी। -मोहम्मद वारिक, एथलीट
मैंने हमेशा गांव के मैदान पर ही अभ्यास किया है। पहले चकरोड पर दौड़ते थे। इसी अभ्यास से मुझे भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में लांग जंप में कांस्य पदक मिला था। -नदीम खान, एथलीट
इन्ही खेतों (मैदान) की जमीन पर अभ्यास करके मैं दिल्ली, मुंबई, विशाखापटनम, चेन्नई में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं खेला हूं। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 100 मीटर दौड़ में मुझे स्वर्ण पदक मिला -मोहम्मद फरमान, एथलीट