जिले में हर माह तीन हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषित चिह्नित किए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण बच्चों को जन्म के बाद से छह माह तक मां का दूध न मिलना है। सिर्फ कुपोषण ही नहीं, ऐसे बच्चे निमोनिया व डायरिया से पीड़ित हो रहे हैं। डॉक्टरों का मानना है कि शून्य से दो साल की उम्र तक के बच्चों की मृत्यु का बड़ा कारण यही है।
जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र में भी हर दिन दो से तीन मरीज भर्ती हो रहे हैं। कुपोषित बच्चों में सबसे ज्यादा मुरादाबाद शहर के हैं। बाल विकास विभाग सर्वे के जरिये हर माह जिले में कुपोषित बच्चों की सूची तैयार करता है। इसके बाद यह सूची स्वास्थ्य विभाग को सौंप दी जाती है। विभाग अपने स्वास्थ्य कर्मियों के जरिये इन बच्चों को दवा व पोषण उपलब्ध कराता है। डॉक्टरों का कहना है कि नौ माह में जन्मे बच्चे का सामान्य वजन 2.5 से 2.8 किलोग्राम तक होना चाहिए। जन्म के छह माह बाद उसका वजन दोगुना हो जाना चाहिए। बाल विकास विभाग की टीम बच्चों के वजन व लंबाई के मुताबिक उन्हें चिह्नित करते हैं।
सिजेरियन डिलीवरी के कारण मासूमों को नहीं मिल रहा मां का दूध
जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ व चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजेंद्र का कहना है कि लोगों में आम धारणा है कि सिजेरियन डिलीवरी के कारण मां को दूध नहीं उतरता। जबकि ऐसा नहीं है। अस्पताल में महिला की देखभाल करने वाली सदस्य सिकाई करें तो दूध उतरने लगता है। चूंकि ऑपरेशन के कारण मां को सीने से लगाकर बच्चे को दूध पिलाने में मुश्किल होती है, इसलिए कटोरी व चम्मच के जरिये बच्चे को दूध पिलाना चाहिए।
दूध के लिए बोतल का इस्तेमाल है खतरनाक
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अवनीश कुमार सिंह कहते हैं कि छोटे बच्चों को दूध पिलाने के लिए बोतल का इस्तेमाल करना खतरनाक है। एक बार बच्चा बोतल से दूध पीने के बाद मां का दूध नहीं पीता। बोतल के दूध में कितना पानी मिलाना है। एक बोतल का इस्तेमाल कितनी बार किया जा सकता है। इसके बारे में लोगों को पता नहीं होता। इस कारण बच्चों में डायरिया व निमोनिया की समस्या आम हो जाती है।
कहां कितने कुपोषित बच्चे
भगतपुर टांडा - 320
बिलारी - 91
छजलैट - 143
दलपतपुर - 361
डिलारी - 325
डींगरपुर - 92
मुरादाबाद शहर - 426
ताजपुर - 146
ठाकुरद्वारा - 244
नोट - यह आंकड़ा जुलाई का है।
- छह माह तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध पिलाना चाहिए। छह माह बाद दलिया, मूंग की दाल का पानी, पपीता, केेला आदि सेमी सॉलिड खिला सकते हैं। मां का दूध न मिलने के कारण ही बच्चों का वजन व लंबाई कम होने के मामले आ रहे हैं। - डॉ. राजेंद्र कुमार, चिकित्साधीक्षक
- हर ब्लॉक में सीएचसी प्रभारियों के साथ समन्वय कर ऐसे बच्चों को दवा व रोषण पहुंचाने का काम किया जाता है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की मदद भी इसमें ली जा रही है। - डॉ. कुलदीप सिंह, सीएमओ