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Mirzapur News: मिलिट्री ग्राउंड में 85 साल बाद भी नेताजी का स्मारक नहीं

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लालगंज का ऐतिहासिक मिलिट्री मैदान, नेताजी ने यहीं पर जनसभा को संबो​धित किया था, स्रोत संवाद
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लालगंज। विंध्य की पहाड़ियों के बीच बसा लालगंज का मिलिट्री ग्राउंड सिर्फ एक मैदान नहीं बल्कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उस शौर्य का गवाह है जिसे वक्त की परतों ने धुंधला कर दिया है। वर्ष 1939 में इसी धरती पर से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजादी का बिगुल फूंका था। विडंबना है कि जिस स्थान से हजारों आदिवासियों ने आजादी की शपथ ली थी वहां आज तक नेताजी की एक अदद प्रतिमा तक स्थापित नहीं हो सकी। स्मारक बनना तो दूर की बात है। क्षेत्र के बुजुर्गों ने बताया कि उन्होंने अपने पिता या दादा से यह बात सुनी थी कि नेताजी कोलकाता से ट्रेन से मिर्जापुर पहुंचे थे। वहां से किसी सरकारी वाहन या आलीशान कार के बजाय उन्होंने महंत शिवाला के एक इक्के को अपनी सवारी चुना। लालगंज के उपरौध क्षेत्र के क्रांतिकारी शिवमूर्ति दुबे, बाबू रघुनाथ सिंह, रविनंदन दूबे, सठौले कोल, केदारनाथ मालवीय,शिवधारी पांडेय और केदारनाथ तिवारी जैसे सेनानियों के बुलावे पर जब नेताजी यहां पहुंचे तो जनसैलाब उमड़ पड़ा था। सोनभद्र की दुर्गम पहाड़ियों से लेकर प्रयागराज के पास हनुमना और चित्रकूट तक के हजारों आदिवासी एक महीने पहले ही पैदल चल पड़े थे। रास्ते भर महुए का आटा खाकर भूख मिटाते हुए ये वनवासी सिर्फ इसलिए लालगंज पहुंचे थे। ताकि वे सुभाष बाबू का संबोधन सुन सकें और देश की आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व झोंक सकें। सठौले कोल के नेतृत्व में जुटे आदिवासियों के इस समर्पण ने राष्ट्रीय मुख्यधारा को नई ऊर्जा दी थी। हालांकि आजादी के आठ दशक बीत जाने के बाद भी यह स्थल एक भव्य स्मारक के लिए तरस रहा है। स्थानीय लोग कई बार मांग उठा चुके हैं लेकिन फाइलें दफ्तरों की धूल फांक रही हैं।
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