गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर जिले के विभिन्न आश्रम, मठों व मंदिरों में सभी तैयारियां मंगलवार को पूरी कर ली गई है। सक्तेेशगढ़ व देवरहा हंस बाबा आश्रम सहित अन्य मठों अपने आराध्य गुरु के दर्शन व पूजन के लिए श्रद्धालु एक दिन पहले ही डेरा डाल दिए।
विंध्याचल, अमरावती स्थित देवरहा हंस बाबा हंस आश्रम में मंगलवार को तैयारियां अंतिम चरण में थीं। पर्व की तैयारियों को लेकर जहां एक और भक्त बेसन के लड्डू बनाने में जुटे रहे वहीं दूसरी ओर प्रसाद के रूप में मखाने को पैकेट तैयार किया जा रहा था। गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर ही आश्रम परिसर में देश के कोने-कोने से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच गए थे। आश्रम परिसर में जिस मचान से बाबा अपने भक्तों को आशीर्वाद देंगे उस मचान को तरह-तरह के पुष्पों पत्तियों और रंग बिरंगी लाइटों से सजाया जा रहा था। सक्तेशगढ़, यथार्थ गीता के प्रणेता स्वामी अड़गड़ानंद महाराज की तपोभूमि सक्तेशगढ़ में गुरु पूर्णिमा को लेकर आश्रम के वरिष्ठ संत नारद ने बताया कि सारी तैयारियां पूर्ण कर ली गयी हैं। प्रशासन के लोग भी तैयारियों के संबंध में बराबर जायजा ले रहे हैं। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अपने अधीनस्थों को दिशा निर्देश दे रहे हैं। कोरोना के दृष्टिगत मुख्य गेट पर ही सैनिटाइज फव्वारे की व्यवस्था है। गाड़ियों को खड़ी करने के लिए कार पार्किंग की व्यवस्था सड़कों के किनारे और आश्रम के उत्तर तरफ किया गया है। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगभग दो किलोमीटर पहले ही प्रशासन द्वारा आवश्यक बैरिकेडिंग कर दी गई है। नारद भगवान ने बताया कि हजारों की संख्या में स्वंयसेवी भक्तों को भी संत महात्माओं भक्तों श्रद्धालुओं के सेवा में लगाया गया है। गुरु पूर्णिमा को आने वाले लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं, संत महात्माओं के भोजन व प्रसाद के लिए एक दिन पहले ही सेवारत भक्त सेवा में लगे हुए हैं। धूप, गर्मी वारिश से बचाव के लिए वाटरप्रुफ टेंट लगाए गए हैँ। पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था की गई है।
शुभ मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि 13 जुलाई को सुबह 4 बजे से शुरू होगी। जो रात 12 बजकर 6 मिनट पर समाप्त होगी। इस दिन गुरु पूर्णिमा पर बन रहा विशेष संयोग बन रहा है। गुरु पूर्णिमा के दिन इस बार मंगल, बुध, गुरु और शनि बेहद शुभ स्थिति में रहेंगे। जिससे रुचक, भद्र, हंस और शश नाम के चार राजयोग बन रहे हैं। गुरु पूर्णिमा बुधवार के दिन पड़ने एवं सूर्य और बुध के एक ही राशि में होने से बुधादित्य योग का निर्माण भी हो रहा है।
- त्रियोगीनारायण उर्फ मिट्ठू मिश्र, आध्यात्मिक धर्मगुर, शेरकोठी विंध्याचल।
गुरु शिष्य परंपरा का बेमिसाल उदहारण है विंध्य पर्वत
भारत भूमि में गुरु का स्थान सर्वोपरि माना गया है। गुरु पूर्णिमा अध्यात्म-जगत का यह महत्वपूर्ण उत्सव है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने मानव जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया था और सभी पुराणों की रचना की थी।
आध्यात्मिक धर्मगुरु त्रियोगी नारायण, मिट्ठू मिश्र ने बताया कि गुरु शिष्य के अपने सनातन परंपरा में विंध्याचल को भी एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। पौराणिक कथाओं का हवाला देते हुए उन्होने बताया कि एक बार हिमालय और विंध्य में प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई कि दोनों में से सबसे विशाल कौन है। इसके बाद दोनों ही अपना आकार बढ़ाने लगे। तब विंध्य पर्वत का आकार बढ़ते-बढ़ते इतना विशाल हो गया कि पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश आना बंद हो गया। चारो तरफ त्राहि-त्राहि मच गया। समाधान के लिए त्रिदेवों ने भी असमर्थता जताई। तब सबने विंध्य के गुरु अगस्त्य मुनि से निवेदन किया कि वह ही अतिशीघ्र अपने शिष्य विंध्य पर्वत को अपना आकार घटाने को कहें। अन्यथा सूर्य का प्रकाश न पहुंच पाने की स्थिति में मानवों पर भारी संकट आ जाएगा। सबकी पुकार पर अगस्त्य मुनि विंध्याचल पर्वत के पास गए। गुरु को देखते ही विंध्याचल पर्वत ने झुककर प्रणाम किया। निवेदन करते हुए कहा गुरुवर मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं। तब उन्होंने कहा कि विंध्य मुझे दक्षिण की ओर जाना है। इसलिए तुम्हारे बढ़े हुए इस आकार के कारण मैं उस पार नहीं जा सकूंगा। गुरु की बात सुनते ही विंध्य पर्वत ने कहा कि गुरुदेव यदि आप दक्षिण में जाना चाहते हैं तो अवश्य ही जाएंगे। इतना कहकर विंध्य पर्वत गुरु के चरणों में झुक गया। तब अगस्त्य मुनि ने कहा कि विंध्य जब तक मैं दक्षिण देश से वापस न लौट आऊं तब तक तुम ऐसे ही झुके रहना। यह कहकर अगस्त्य चले गए। लेकिन वे आज तक वापस नहीं लौटे। अपने गुरु के आदेश पर विंध्य पर्वत उसी तरह से झुका हुआ है।