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संस्कृत भारतीय संस्कृति का मूलाधार

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चुनार। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विश्राम सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय एवं उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी का रविवार को समापन हुआ। समापन सत्र का आरंभ वीणा वादिनी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। महाविद्यालय की छात्राओं ने सरस्वती वंदना, स्वागत गीत और कुलगीत प्रस्तुत किया। समापन संगोष्ठी समारोह के विशिष्ट अतिथि महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी के प्रोफेसर सुरेश चौबे ने उन्नयन वैश्विक उत्कर्ष तथा जन अभिरुचि की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक हैं, यह अनेक प्राचीन और आधुनिक भाषाओं की जननी है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के डा. शरशिंदु त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत आर्य भाषा के उद्गम की स्त्रोत रही है। सारस्वत अतिथि डा. सत्येंद्र सिंह ने कहा कि संस्कृत ज्ञान की निधि है। वेदों का महत्व आज भी है उन्होंने संस्कृत को सर्जनशील, समृद्ध भारतीय सांस्कृतिक गौरव को सहेज कर रखने वाली आधुनिक युग में लोकप्रिय तार्किक तथा तकनीकी प्रयोग हेतु उपयुक्त बताया। मुख्य अतिथि डा. विनिता यादव ने कहा कि आज इस भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए संस्कृत वांडमय की महती आवश्यकता है तभी हमारे समाज में संतुलन बना रहेगा। संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रही महाविद्यालय की प्राचार्या डा. मंजू शर्मा ने कहा कि संस्कृत भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली भाषा है। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विश्वविद्यालय और महाविद्यालय से आए विद्वानों ने शोध पत्र प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में कुल 225 प्रतिभागी रहे। आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी की आख्या डा. प्रभात कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया। इस मौके पर डा. अशर्फी लाल, डा. राम निहोर, डा. सूबेदार यादव, डा. माधवी शुक्ला, डा. रजनीश, डा. भास्कर द्विवेदी, डा. अरुणेश, डा. दीप नारायण आदि प्रमुख मौजूद रहे। संचालन डा. शेफालिका राय ने किया।
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