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World Sparrow Day: शहरीकरण, पक्की छतों ने छीन लिया गौरैया का घरौंदा, 20 से 30 फीसदी  कम हुई संख्या

Mon, 20 Mar 2023 04:53 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

गौरैया की संख्या लगातार घट रही है। शहरीकरण और पक्की छतों ने गौरैया का परिवेश और उसका घोंसला छीन लिया है। ऐसे में इसके संरक्षण की आवश्यकता है।
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गौरैया -फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शहरीकरण और पक्की छतों ने गौरैया का परिवेश और उसका घोंसला छीन लिया है। जो गौरैया कच्चे मकानों की छतों पर रेत में स्नान करती थीं और छतों की कड़ियों में घोंसला बनाकर रहती थी, लेकिन अब उनके लिए ऐसा परिवेश नहीं रह गया है। ऐसे में वह दूर के गांवों की ओर या तो पलायन कर गई हैं या फिर उनकी प्रजाति समाप्ति की ओर है। एक अनुमान के अनुसार गौरैया की संख्या 20 से 30 फीसदी तक कम हुई है। 

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घर की चिड़िया गौरैया आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। चिड़ियों को कैमरे में कैद करने वाले और प्रकृति प्रेमी डॉ. विवेक बनर्जी और डॉ. रविंद्र राणा का कहना है कि यूरोप में गौरैया संरक्षण-चिंता का विषय बनी हुई है। ब्रिटेन में तो यह रेड डॉटा में शामिल हो चुकी है। भारत वैज्ञानिक भी कई मंचों और शोधों के माध्यम से पिछले कुछ सालों में गौरैया की संख्या में गिरावट की पुष्टि कर चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर के सर्वेक्षण ने इस पर मुहर भी लगा दी है। 

यह भी पढ़ें: World Sparrow Day: मेरठ में 12 वर्षों से गौरैया बचाने की मुहिम चला रहे एनएएस के शिक्षक, रंग ला रहा प्रयास

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चिंता यह भी जताई गई है कि यदि घर की चिरैय्या पर गौर नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब यह किताबों तक सिमट कर रह जाएगी। बीते कुछ वर्ष से गौरैया को बचाने को लेकर कुछ लोग जागरूक हुए हैं और अपनी छतों पर दाना और पानी रख रहे हैं। इसके अलावा लकड़ी से बने घोंसले भी अपने मकानों में लटका रहे हैं।  

गौरैया के विलुप्त होने के प्रमुख कारण
आधुनिक बनावट वाले मकानों में गौरैया को अब घोंसले बनाने की जगह ही नहीं मिलती। इससे उसके जन्मे-अजन्मे बच्चे बाहर बिल्ली, कौए, चील, बाज के शिकार बनते हैं। गौरैया छोटे पेड़ों या झाड़ियों में भी घोंसला बनाती हैं, लेकिन मनुष्य उन्हें भी काटता-छांटता जा रहा है।

बबूल, कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी आदि पेड़ों को पसंद करती है पर ये पेड़ भी अब कम होते जा रहे हैं। शहरों और गांवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फोन के टॉवर भी गौरैया समेत दूसरे पक्षियों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती हैं।

गौरैया कृषि और पर्यावरण के लिए फायदेमंद
पर्यावरण को बेहतर बनाने में गौरैया का बड़ा योगदान है। गौरैया अपने बच्चों को अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े भी खिलाती है, जो हमारी फसलों के लिए हानिकारक होते हैं। प्रकृति की सभी रचनाएं कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं और हम भी उनमें शामिल हैं। विश्व भर में गौरैया की 26 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं। 
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