मेरठ। अभी तक आपने संपत्ति की वसीयत के बारे में सुना होगा, लेकिन देहदान को लेकर भी वसीयत की जा रही है। नेत्र, अंग और देहदान को लेकर न केवल स्वयं वसीयत की, बल्कि लोगों को भी अंगदान के प्रति जागरूक करते हुए इंसानियत का पैगाम दे रहे हैं हरिनगर (ब्रह्मपुरी) निवासी समाजसेवी एडवोकेट डाॅ. तारा सिंह। 20 से अधिक लोगों को वह अपने साथ जोड़ चुके हैं।
67 बरस के तारा सिंह ने गवाहों की मौजूदगी में वसीयतनामा तैयार कराया है। इसमें लिखा है कि मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। यह कब और कहां आ जाए कुछ पता नहीं। मैं मृत्यु से नहीं डरता, क्योंकि यह जीवन की वास्तविकता है। मेरी इच्छा है कि मेरे नेत्रों से किसी की अंधेरी दुनिया में उजाला हो, मेरे अंग किसी का जीवनदीप जलाएं और देह मेडिकल कॉलेज के छात्रों के ज्ञानार्जन के काम आए। पत्नी भारती सिंह तथा बेटे व बेटी समेत परिजन और रिश्तेदारों की सहमति से वसीयत लिखी है। अपनी लिखी किताबों में भी वह अंगदान को जागरूक कर रहे हैं।
नेत्रहीन बच्ची को देख लिया प्रण
डाॅ. तारा सिंह बताते हैं कि 1991 में राष्ट्रीय दृष्टि बाधित संस्थान देहरादून में एक कार्यक्रम में जाना हुआ। एक दस साल की बच्ची सीढि़यों पर बैठी थी। बड़ी-बड़ी आंखों वाली बच्ची मुस्कुरा रही थी। बच्ची से बात की तो पता लगा वह नेत्रहीन है। इतनी सुंदर बच्ची और नेत्रहीन ...., मैं एकदम स्तब्ध रह गया। उसी समय नेत्रदान, अंगदान और देहदान का प्रण लिया। वह कहते हैं कि पश्चिमी देशों में देहदान बहुत अधिक है। स्पेन में 40, ब्रिटेन में 27, कनाडा में 14 व अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया में 11 लोग प्रति दस लाख पर देहदान करते हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा महज 0.08 फीसदी है।
अंगदान को बने अनिवार्य कानून
एडवोकेट डाॅ. तारा सिंह कहते हैं कि सड़क दुर्घटना में सैकड़ों लोग जीवन खो देते हैं। ऐसे में अकाल मृत्यु प्राप्त लोगों के अंगदान को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसी के साथ लावारिस शवों को भी इस कानून के तहत शामिल किया जाना चाहिए। इस सकारात्मक सोच से जरूरतमंदों को जिंदगी मिलेगी। वे कहते हैं कि देहदान श्रेष्ठतम परोपकार है। आधुनिक मेडिकल साइंस ने मानव अंगों का प्रत्यारोपण संभव कर दिया है। अब चिकित्सक 19 अंगों को प्रत्यारोपित कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में अंगदान की मुहिम चलाकर वह दो दर्जन लोगों को देहदान के प्रति समर्पित करवा चुके हैं।