हस्तिनापुर (मेरठ)। भारतीय किसान संघ के तत्वावधान में जंबूद्वीप में चल रहे तीन दिवसीय गो आधारित जैविक कृषि कृषक सम्मेलन के तीसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने महाभारत कालीन ऐतिहासिक नगरी में मौजूद प्राचीन स्थलों का भ्रमण कर पूजा अर्चना की।उन्होंने कहा कि हस्तिनापुर शांतिपूर्ण वातावरण एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है।
सुबह करीब 10 बजे जंबूद्वीप के बंगला नंबर 10 से बाहर निकले मोहन भागवत महाभारत कालीन प्राचीन पांडेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे। जयंती माता मंदिर के आचार्य मुकेश शांडिल्य ने विधिविधान से पूजा संपन्न कराई। मंदिर की प्राचीनता का महत्व उन्हें बताया। उसके बाद प्राचीन जयंती माता शक्तिपीठ के दर्शन किए। पूजा-अर्चना के बाद बूढ़ी गंगा किनारे स्थित प्राचीन कर्ण मंदिर पहुंचे। मंदिर के महंत शंकर देव महाराज ने पूजा कराई और बताया कि यह विश्वविख्यात स्थान है। यहां कर्ण पूजा-अर्चना के बाद हर रोज सवा मन सोना गरीबों को दान किया करते थे। नेचुरल साइंससेज ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रियंक भारती ने प्राचीन बूढ़ी गंगा के महत्व को बताया।
प्राचीन स्थलों का भ्रमण करने के बाद मोहन भागवत बोले कि वाकई महाभारत कालीन ऐतिहासिक नगरी आध्यात्मिक ऊर्जा से भरी हुई है। महाभारत काल से आज तक इस भूमि की महत्ता और अच्छी महसूस की जा रही है। यहां पर आज भी मन को शांति देने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा मिल रही है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण वातावरण और हरियाली के बीच मौजूद यह नगरी बहुत ही मनभावन है। उन्होंने कहा कि अब वह इस स्थान पर आते रहेंगे।
मंच पर यह रहे मौजूद
कार्यक्रम में भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बद्रीनाथ चौधरी, राष्ट्रीय महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र, राष्ट्रीय सह जैविक प्रमुख ठाकुर धर्मपाल सिंह रहे। संचालन प्रांत महामंत्री डॉ. कुलदीप तथा अध्यक्षता प्रांत अध्यक्ष संजीव कुमार ने की। कार्यक्रम के व्यवस्थापक आकाश राठी रहे। इस मौके पर संघ के क्षेत्र प्रचारक महेंद्र शर्मा, क्षेत्रीय सरसंघ चालक सूर्य प्रकाश टांक, प्रांत प्रचारक अनिल, प्रांत कारवां फूल सिंह, जिला प्रचारक धनंजय, क्षेत्रीय संगठन मंत्री उत्तर-पूर्व श्रीनिवास, प्रचार प्रमुख सुरेंद्र आदि मौजूद रहे।
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विनोबा भावे का कथन किया याद
मोहन भागवत ने कहा कि एक बार कुछ किसान एकत्रित होकर विनोबा भावे के पास पहुंचे, जिन्होंने कहा कि उनकी गेहूं की फसल में भीषण कीट लगे हुए हैं। गेहूं की फसल बर्बाद हो रही है। विनोबा भावे ने कहा कि जब आप मेंढक को पकड़ कर बेच रहे हैं तो इससे प्रकृति का चक्र बाधित हो रहा है, क्योंकि मेंढक पर सबसे ज्यादा प्रयोग विज्ञान में किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि इन कीटों को मेंढक कहते हैं और मेंढक जब अधिक हो जाते हैं तो उन्हें सर्प कहते हैं और जब सर्प अधिक हो जाते हैं तो उन्हें मोर कहते हैं, यह प्रकृति का चक्र है। इस नियम के आधार पर ही प्रकृति चलती है। इससे छेड़छाड़ करना ठीक नहीं होगा।
भागवत ने याद दिलाए शबरी के मीठे बेर
- त्रेता युग में भगवान राम ने खाए थे शबरी के बेर
रविंद्र चौहान
हस्तिनापुर (मेरठ)। भारतीय किसान संघ के तत्वावधान में आयोजित गो आधारित जैविक कृषि कृषक संगम कार्यक्रम में किसानों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक डॉ. मोहन भागवत ने त्रेता युग को याद करते हुए भगवान राम का जिक्र किया। कहा कि रासायनिक खेती ने हमारी कई औषधियों को पूरी तरह नष्ट कर दिया है, जिनमें से एक है शबरी मां का मीठा बेर है, जो भगवान श्रीराम ने भी खाया था।
उन्होंने कहा कि बेर अपने आप में एक पौष्टिक फल है, जिससे शरीर में कई पोषक तत्व की प्राप्ति होती है। आज से सौ वर्ष पूर्व किसानों के खेतों की मेढ़ और रास्तों में इधर-उधर बेर के पेड़ काफी मात्रा में देखे जाते थे, जो आज विलुप्त हो रहे हैं। उन्होंने दूसरी रामबाण औषधि बताई बथुआ। उन्होंने बताया कि बथुआ किसानों के खेतों में भरपूर मात्रा में मिलता था, जो मनुष्य के पेट के लिए एक रामबाण दवाई है। इससे कई प्रकार की बीमारी स्वत: ही नष्ट हो जाती है, परंतु रासायनिक खेती के कारण हम अपनी इन प्राचीन औषधियों को समाप्त कर रहे हैं। इस समय तो हमें पूजा के लिए पत्तों को भी तलाशना में पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि गणेश उत्सव के समय 21 पेड़ों के पत्ते रखे जाते थे, जो आसपास ही मिल जाया करते थे। परंतु आज इन्हें ढूंढना मुश्किल हो गया है, जिससे हमारी पूजा के भी नियम बदलते जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि अपनी संस्कृति को बचाने के लिए हमें गो आधारित खेती करनी होगी। (संवाद)