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कैलाश प्रकाश स्टेडियम में सात साल से नहीं है तीरंदाजी कोच
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तीरंदाजों ने बिना कोच राष्ट्रीय स्तर पर साधा निशाना, जीते पदक
संवाद न्यूज एजेंसी
मेरठ। जिले के होनहार तीरंदाजों पर गुरु का आशीर्वाद नहीं है। वह बिना कोच के सात साल से कैलाश प्रकाश स्टेडियम में अभ्यास कर रहे हैं। मेहनत के बल पर उन्होंने नेशनल में क्रांतिधरा का नाम रोशन किया है। स्टेडियम में वर्तमान में 20 से अधिक खिलाड़ी दिन-रात अभ्यास कर रहे हैं। कई बार तो खिलाड़ी खुद के खर्चे पर खेल सामग्री जुटाते हैं। गुहार लगाने के बावजूद कोच की नियुक्ति नहीं हो पाई है।
मूल रूप से सहारनपुर निवासी अनीता पोडवाल पुलिस विभाग में कार्यरत हैं। रजपुरा भूडपुर गांव निवासी अमित शेरवाल व हरीश, खरदौनी निवासी दानिश चौहान, लालकुर्ती निवासी ताशु सिंह, शुभम शर्मा राष्ट्रीय स्तर पर पदक झटक चुके हैं। इनमें अनीता ऑल इंडिया पुलिस व सीनियर नेशनल में पदक अपने नाम कर चुकीं हैं। छठे खिलाड़ी नीरज चौहान राष्ट्रीय खेलों के साथ अंतरराष्ट्रीय खेलों में कदम बढ़ा चुके हैं। उन्होंने वर्ल्डकप की चार स्टेजों में प्रतिभाग कर जिले का नाम रोशन किया है। कभी स्टेडियम में रसोइया अच्छेलाल खिलाड़ियों की डाइट का ख्याल रखते थे। आज उनका बेटा नीरज आईटीबीपी में नौकरी करते हुए वर्ल्डकप में कोरिया, स्विटजरलैंड, पेरिस, तुर्की में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व कर चुका है। नीरज के खेल को सभी ने सराहा है।
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अन्य खेलों का हाल यही
स्टेडियम में तीरंदाजी के साथ बैडमिंटन का भी कोच नहीं है। कुछ खेल तो बंद होने की कगार पर ही पहुंच गए हैं। इनमें जिम्नाष्टिक, जूडो, वुशू शामिल हैं। खेल अधिकारी भी कोई ठोस जवाब देने को तैयार नहीं हैं। पिछले कई सालों से अधिकारी जल्द कोच नियुक्त करने का आश्वासन देते आ रहे हैं।
कई बार लिख चुके पत्र
आरएसओ योगेंद्रपाल सिंह का कहना है कि खेल निदेशालय से ही कोच आते हैं। कई बार इस बारे में पत्र लिखकर अवगत कराया गया है, लेकिन अभी तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है। वह अपने स्तर से खिलाड़ियों की मदद करते हैं।
खेल के साथ नाइंसाफी
तीरंदाजी आज के युवाओं का खेल नहीं है, बल्कि हजारों सालों से इसका अपना महत्व रहा है। सात साल से स्टेडियम में कोच नहीं है, ये खेल के प्रति नाइंसाफी है। खेल अधिकारियों को कोच के बारे में विचार करना चाहिए। - विवेक चिकारा, तीरंदाजी के पैरालंपियन खिलाड़ी
बिना कोच प्रभावित हुआ प्रशिक्षण
पिछले साल से तीरंदाजी का कोच न होने से परेशानी तो बहुत हुई, लेकिन लगन से मेहनत करते रहे। सीनियर खिलाड़ियों से सीखे। नेशनल तक का सफर पूरा किया है। कोच की बहुत जरूरत है। - दानिश चौहान, राष्ट्रीय स्तरीय खिलाड़ी
कोच के इंतजार में रहते तो भविष्य खत्म हो जाता
स्टेडियम में कोच का इंतजार करते तो हमारा तो भविष्य ही दांव पर लग जाता। हमने हिम्मत नहीं हारी, राष्ट्रीय खेलों के दम पर आईटीबीपी में नौकरी मिल गई। जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा वर्ल्डकप में खेलने का मौका मिला। - नीरज चौहान, अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज
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वरिष्ठों को ही मान लिया गुरु
सीनियर खिलाड़ियों को कोच मानकर सीखते हैं और प्रशिक्षण लेकर घर लौट जाते हैं। सीनियर खिलाड़ियों ने कोच से भी ज्यादा सपोर्ट किया। यही कारण है कि राष्ट्रीय खेलों तक पहुंचने का अवसर मिला। - अनीता पोडवाल , राष्ट्रीय तीरंदाज
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