सब कुछ खत्म हो जाने और असफलताओं के दौर से गुजरने वाला कोई इंसान कब जिंदगी से हारकर आत्महत्या जैसे गलत रास्ते पर कदम बढ़ा दे, यह कोई नहीं समझ सकता। लेकिन अपनों का साथ, प्यार और आत्मविश्वास ऐसे दोस्त हैं, जो आत्महत्या के लिए उकसाने वाले हर पल को मात दे सकते हैं।
बुधवार रात शास्त्रीनगर में व्यापारी और उसके परिवार से जुड़ा प्रकरण शहरवासियों के सामने कई सवाल छोड़ रहा है। वहीं, चंद महीनों पहले टीपी नगर में आत्महत्या के कारण पांच सदस्यों वाले पूरे परिवार का चला जाना भी जिंदगी के उस स्याह पक्ष को उजागर करता है, जब जीवन में नकारात्मकता पूरी तरह हावी होती है। इससे अलग हमारे बीच ऐसे परिवार और लोग भी हैं, जो आत्महत्या करने के उस खौफनाक ख्याल से उबरे और आगे बढ़े। इन लोगों ने जीवन खत्म करने की गलत सोच को ध्यान, इलाज और अपनों के साथ की मदद से खत्म कर नए तरह से जिंदगी जीनी शुरू कर दी। आत्महत्या का वो ख्याल इन लोगों को आज किसी डरावनी कहानी का हिस्सा लगता है, जिसे वे पूरी तरह भूलकर आगे बढ़ रहे हैं।
केस वन-- अपना इरादा बदलकर बने प्रेरणा
माधवपुरम निवासी सुनील दत्त आत्महत्या के उफान से उबरकर दूसरों को जीवन की अहमियत समझाते हैं। सुनील कहते हैं कि 1997 में मैं बिजनेस, समाज, परिवार हर तरफ से असफलताओं से घिर चुका था। मेरे सामने सिर्फ परेशानियां थीं। कोई हल और सहारा दूर तक नहीं था। मैं डिप्रेशन में चला गया, मेडिकल कॉलेज में इलाज भी लिया। लेकिन मन क ी हलचल खत्म नहीं हो रही थी। एक दिन तंग आकर जीवन खत्म करने के लिए घर से भाग गया। आत्महत्या का विचार इतनी तेजी से मन में था कि सब कुछ भूल चुका था। लेकिन मेरे अंतर्मन से आवाज आई कि जीवन लड़ने का नाम है। बस उसके बाद मैंने मन लगाकर अपना इलाज कराया, नए रोजगार की तलाश की और जीवन को एक नई रोशनी से रोशन किया। प्रतिदिन ध्यान लगाता हूं, रैकी थेरेपी सीखकर दूसरे लोगों को भी जागरूक करता हूं।
केस 2 - जिंदगी में अब गम नहीं सुकू न है
ज्वैलरी कारोबारी विकास क ो जिंदगी बहुत अजीज है। शास्त्रीनगर निवासी 34 वर्षीय विकास कहते हैं कि साल 2001 में कारोबार में खासा नुकसान हुआ। लाखों रुपया डूबने से इतना बड़ा झटका लगा कि सब कुछ खत्म लगने लगा। हर समय तनाव और चिड़चिड़ापन रहता। घर में टेंशन रहती। दिन-रात यही चिंता सताती कि इस घाटे से कैसे उबरूंगा। सारे रास्ते बंद दिखे तो लगा कि अंतिम राह बस आत्महत्या है। एक दिन तड़के 4 बजे चुपचाप आत्महत्या करने के लिए निकल गया। कुछ लोगों ने मुझे आत्महत्या के पाप से बचा लिया। परिवार ने इलाज कराया। मैंने सत्संग में जाना शुरू किया। परिवार से बातचीत कर अपने मन की सारी पीड़ा कही, तो दोस्तों और परिवार ने इस कदर मेरा हौसला बढ़ाया कि धीरे-धीरे व्यापार की गाड़ी पटरी पर आने लगी। आज कभी भी उस पल को सोचता हूं तो खुद पर शर्म आती है। मैं क्या करने चला था। खुरदुरी लगने वाली जिंदगी अब सुकून की नई आशा महसूस होती है।
केस 3 - भूतिया फिल्म जैसे थे वो चंद पल
एमटेक करके निजी कंपनी में नौकरी करने वाले अभय ने जिंदगी में दो बार आत्महत्या का प्रयास किया। अभय बताते हैं कि 10वीं के बोर्ड पेपर में फेल होने के बाद आत्महत्या करने चला तो घरवालों ने पकड़कर बचा लिया। बाद में ठंडे दिमाग से सोचा तो सब ठीक हो गया। लेकिन ग्रेजुएशन के वक्त अपने पहले प्यार को खोने का जो गम था, उस वक्त मुझे कुछ नहीं सूझा। एक दिन वो गलत कदम उठाने निकल पड़ा। भगवान को शायद मेरी जिंदगी प्यारी थी, उन्होंने मुझे मौत के मुंह से वापस भेज दिया। परिवार के सहयोग से दोबारा जिंदगी शुरू की। आज नौकरी और परिवार सब है। अब कभी वो दिन याद आता है तो रातों को नींद नहीं आती। आत्महत्या के वो दो पल पूरी तीन घंटे की भूतिया फिल्म लगते हैं। सभी जूनियर्स को जिंदगी जीने के लिए प्रेरित करता हूं। ताकि किसी और का जीवन डरावनी फिल्म न बने।
मन की उलझन सुलझाएं
आत्महत्या क रने की कोई निश्चित उम्र या वर्ग नहीं होता। युवाओं में यह भावना बहुत तेजी से आती है। मानसिक तनाव, परिवार की अधिक उम्मीदें, परीक्षा में असफलता, आपसी संबंधों में खटास, दोस्तों से अनबन होने जैसे कई कारण हैं जो युवाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए बहुत जरूरी है कि परिजन और बच्चों को पूरा समय दें। बच्चों से संवाद करें। उनको वक्त देकर उनके मन की उलझन सुलझाएं। घर में सकारात्मक माहौल बनाए रखें। बच्चे में गुमसुम, चिड़चिड़ापन या तनाव आए तो तुरंत मनोचिकित्सक की सलाह लें। -डॉ. पूनम देवदत्त सीबीएसई एग्जाम काउंसलर