अतिशय के परिजनों के लिए वो नौ दिन नौ साल की तरह बीते। हर एक पल एक अनजाना सा डर सताता रहा। घर के लाडले का अपहरण हो जाने से भूख प्यास, नींद, सुख, चैन सब उड़ चुका था।
हर आहट यही अहसास कराती रही कि अतिशय अभी आकर मां से लिपटकर कहेगा कि जल्दी खाना दो, मुझे भूख लगी है। आखिर दसवें दिन अतिशय खुशियां लेकर लौटा तो हर बुझा चेहरा खिल उठा और उसे एक नजर देखते ही आंखें खुशी से छलक उठीं।
परिजनों के अनुसार 19 फरवरी को जब अतिशय का अपहरण हुआ तो पूरा परिवार एक तरह से सदमे में चला गया था। मां शिखा ने खाना छोड़ा तो पिता मयंक जैन और चाचा मलूक ने कारोबार भूलकर अतिशय को ढूंढना शुरू कर दिया। बड़े भाई के एग्जाम सिर पर थे, लेकिन वह उसे भूल गया।
दादा-दादी अतिशय को एक नजर देखने के लिए व्याकुल हो गए। पूरे घर की दिनचर्या अस्तव्यस्त हो गई। रिश्तेदारों और शुभचिंतकों का घर पर तांता लगना शुरू हो गया।
घर में किसी भी सदस्य के मोबाइल फोन की घंटी बजती तो सभी की निगाहें इस उम्मीद में उस तरफ चली जाती कि अतिशय की कोई सूचना मिलेगी। आखिरकार 28 फरवरी को अतिशय सकुशल घर पहुंच गया तो सब कुछ वैसे ही हो गया, जैसे पहले था।
खिला अतिशय का चेहरा
सोमवार को अतिशय स्कूल जाने का तैयार था, लेकिन परिजन उसे अभी कुछ देना आराम देना चाहते थे, इसलिए उसे स्कूल नहीं भेजा। अतिशय भी अपने भाई और घर आए रिश्तेदारों के बच्चों के साथ मस्त हो गया। नौ दिनों बाद उसे चेहरे की रौनक लौटी। वह खुद भी धीरे-धीरे उन भयावह पलों को भूलकर नार्मल होने की कोशिश कर रहा है।
‘हम सभी के आभारी हैं’
अतिशय के पिता मयंक जैन ने सोमवार को कहा कि पुलिस-प्रशासन ने संकट की इस घड़ी में उनकी पूरी मदद की। क्राइम ब्रांच की टीम दिन रात लगी रही। घर, परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज उनके सभी शुभचिंतकों की दुआएं अतिशय के साथ थीं। इन सभी के प्रयास और दुआओं का ही नतीजा है कि उनका बेटा सकुशल घर लौट आया है। यह उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है। वह सभी के आभारी हैं।
फिरौती वसूलकर अतिशय को मारने की थी अपहरणकर्ताओं की प्लानिंग
13 साल का मासूम अतिशय अपहरणकर्ताओं के चंगुल से ही नहीं, मौत के मुंह से भी निकलकर आया है। अपहरण का यह ऐसा मामला था, जिसमें रक्षक ही भक्षक बनने जा रहे थे। पुलिस सूत्रों की मानें तो इन अपहरणकर्ताओं का प्लान फिरौती लेकर अतिशय को मारने का था, लेकिन पुलिस की सटीक कार्रवाई और अपहरणकर्ताओं के लालच ने अतिशय को सुरक्षित घर पहुंचा दिया।
अतिशय अपहरण कांड का अहम पक्ष यही है कि मुख्य आरोपी प्रतीक जैन अतिशय का रिश्तेदार रहा। वह अतिशय के पिता मयंक जैन के बिजनेस प्रोफाइल और परिवार से भलीभांति परिचित था। इसलिए अपहरणकर्ता अच्छी तरह जानते थे कि यदि अतिशय को जीवित छोड़ दिया तो वह उनका भांडा फोड़ देगा।
सूत्रों के अनुसार अपहरणकर्ताओं का लालच ही अतिशय का जीवन रक्षक बना। अपहरणकर्ताओं ने शुरूआत में अतिशय के परिजनों से दो करोड़ रुपये की फिरौती मांगी थी। उनकी यही प्लानिंग थी कि परिजनों से जितनी ज्यादा से ज्यादा रकम मिल जाए। लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद यह रकम 23 लाख रुपये तय हुई थी। यह रकम अपहरणकर्ताओं ने परिजनों से वसूल ली थी, लेकिन अतिशय को छोड़ा नहीं।
उसकी यही वजह थी कि यदि अतिशय को छोड़ दिया गया तो उनकी पहचान होना तय है। अतिशय को आगे रखकर फिर से फिरौती वसूली जाए और फिर सुबूत को ही खत्म कर दिया जाए। इसलिए 23 लाख रुपये वसूलने के बाद भी अपहरणकर्ताओं के मन में लालच आ गया।
उनकी प्लानिंग थी कि अतिशय को कुछ दिन और अपने पास रखकर दोबारा फिरौती की रकम मांगी जाए। चर्चा यह भी रही कि अपहरणकर्ताओं की योजना दूसरी फिरौती वसूलकर अतिशय को हरिद्वार ले जाकर नहर में फेंकने की थी।
लेकिन तब तक पुलिस और क्राइम ब्रांच पूरी तरह से सक्रिय हो चुकी थी। अपहरणकर्ता फिर से फिरौती वसूलते या अतिशय के साथ कोई अनहोनी करते, इससे पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गए, और अतिशय सकुशल बरामद हो गया।
अतिशय को गुड़गांव में आस्था की निगरानी में रखा
अतिशय जैन के अपहरणकर्ताओं ने हर कदम पर शातिर दिमाग लगाया। अतिशय को गुड़गांव में आस्था की निगरानी में छोड़ा और प्रतीक समेत चारों आरोपियों ने फिर मेरठ में ही पहुंचकर गढ़ रोड स्थित हारमनी होटल में डेरा डाल लिया।
अपहरणकर्ता शहर में ही रहकर जैन परिवार और पुलिस के हा मूवमेंट और एंगल को लेकर पल-पल अपडेट होते रहे। हर कदम उन्होंने फूंक-फूंककर रखा, लेकिन आखिरकार पुलिस के हत्थे चढ़ ही गए।
शास्त्रीनगर में मिली थी लोकेशन
अतिशय के अपहरण के बाद जब प्रतीक, तुषार, राहुल और मोनू हारमनी होटल में आकर रुके थे तो पुलिस को उनकी लोकेशन शास्त्रीनगर इलाके में मिली थी। हालांकि पुलिस उनको तलाश नहीं कर पाई थी।
अपहरणकर्ताओं को यह भी पता चल चुका था कि पुलिस ने अपनी पूरी फिल्डिंग गुड़गांव में लगा रखी है। उसके बाद अपहरणकर्ताओं ने शहर में रुककर पुलिस और अतिशय के परिवार की हर गतिविधि जानी।
एक कॉल के बाद 40 किमी रन
गुड़गांव हाईवे पर अपहरणकर्ताओं ने रिक्शा चालक ऋषिपाल के मोबाइल फोन से अतिशय के पिता मयंक जैन को चार कॉल की थीं। पुलिस जब ऋषिपाल तक पहुंच गई तो अपहरणकर्ताओं ने उसका मोबाइल फोन फेंक दिया था। अतिशय के परिजनों को कॉल करने के बाद अपहरणकर्ता उस जगह से 40 किमी दूर चले जाते थे।
आरोपियों ने अधिकांश कॉल गुड़गांव हाइवे से कीं। पुलिस का दावा है कि अपहरणकर्ता जल्द न पकड़े जाते तो वे अतिशय के साथ अनहोनी कर सकते थे।
ट्रेकर लगा बैग फेंका, टोल के कैमरे में कैद हुए
24 फरवरी को अपहरणकर्ताओं ने अतिशय के परिजनों को फिरौती की रकम लेकर गुड़गांव हाईवे पर बुलाया था। शर्त रखी थी कि कैश और जेवरात से भरा बैग सड़क पर रखकर निकल जाना। पुलिस ने भी इस दौरान चारों तरफ फिल्डिंग लगा दी थी।
परिजन बैग रखकर वहां से दूर हट गए। इस दौरान चार कारें गुजरने के बाद पांचवीं कार आई-10 धीमी हुई और बैग उठाकर तेजी से निकल गई। बैग तो चला गया लेकिन अतिशय को मुक्त नहीं किया गया। इससे परिजनों और पुलिस की चिंता बढ़ गई। पुलिस ने उस बैग में ट्रेकर लगा रखा था, ताकि अपहरणकर्ताओं की लोकेशन पता लगती रहे।
कुछ दूरी तक तो पुलिस जीपीएस लोकेशन के हिसाब से पीछे दौड़ी लेकिन आगे जाकर उन्हें वही ट्रेकर लगा बैग पड़ा मिला। अपहरणकर्ता उस बैग से कैश और जेवर निकालकर बैग फेंककर फरार हो चुके थे। जिसके बाद पुलिस भटक गई।
हालांकि पुलिस ने दिल्ली और गुड़गांव के बीच टोल प्लाजा पर उस कार की लोकेशन लेनी चाही तो टोल के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में वह कार दिल्ली की तरफ निकलना सामने आई। उस कार के नंबर का आरटीओ से पता लगाया गया तो तुषार का नाम सामने आया। उसके जरिये ही प्रतीक का नाम सामने आने पर यह केस खुलता चला गया।