- मोनू गुर्जर की हत्या के बाद शोभापुर गांव में तनावपूर्ण शांति
- दलित-गुर्जर संघर्ष में विराम लगाने में पुलिस रही नाकाम
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। शोभापुर गांव में मोनू गुर्जर की हत्या के बाद जातीय तनाव और बढ़ गया है। दोनों पक्षों में समझौता करने वाले समाज के जिम्मेदार लोग भी अब पीछे हटना शुरू हो गए हैं। उनका कहना है कि दोनों बिरादरियों के युवकों में तनातनी बढ़ती जा रही है। वहीं, ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस दलित-गुर्जर संघर्ष में विराम लगाने में नाकाम साबित हुई है।
कंकरखेड़ा थाना क्षेत्र के शोभापुर गांव में दो अप्रैल 2018 के बवाल के बाद बसपा नेता गोपी पारिया की हत्या हुई थी। जिसके बाद गुर्जर और अनुसूचित जाति के युवकों में तनातनी बढ़ गई थी। गोपी हत्याकांड में शोभापुर निवासी सपा नेता मनोज गुर्जर समेत तीन आरोपी जेल में बंद हैं। वहीं, दूसरे पक्ष के युवकों ने उस समय गोपी पारिया की हत्या के बदले में गुर्जर समाज के नौ लोगों को मारने का एलान किया था। 16 दिसंबर 2018 को शोभापुर में गुर्जर समाज के तीन युवकों पर जानलेवा हमला हुआ, जिसमें मनोज गुर्जर पक्ष के आशीष गुर्जर की हत्या कर दी गई थी। गांव का माहौल खराब होने पर जिम्मेदार लोग और सामाजिक कार्यकर्ता आगे आए थे। इन जिम्मेदार लोगों ने दोनों बिरादरी के लोगों को एक साथ बैठाकर पंचायत कराई। इससे माहौल शांत होता गया।
इस बीच 20 मार्च को होली वाले दिन गांव का ही मोनू गुर्जर संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गया। 23 मार्च को दायमपुर गांव के जंगल में एक युवक का अधजला शव मिला, जिसकी शनाख्त 24 मार्च को मोनू के रूप में हुई। मोनू की अपहरण के बाद हत्या होने पर शोभापुर में फिर से जातीय तनाव की स्थिति बन गई। लेकिन दोनों पक्षों में समझौता करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस बार अपने हाथ खींच लिए। इसके पीछे पुलिस का लचीलापन माना जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि शोभापुर की चिंगारी फिर से भड़की तो पता नहीं कितने लोगों की जान जाएगी।
पुलिस की प्लानिंग फेल
आशीष गुर्जर की हत्या के दौरान दूसरे पक्ष के युवकों ने गोपी पारिया की हत्या का बदला देने की बात कहीं थी। चार अप्रैल को गोपी पारिया की बरसी तक पांच लोगों को मारने का एलान करने की चर्चा सामने आई थी। लेकिन इसकी जानकारी होने के बावजूद भी पुलिस आरोपियों पर शिकंजा नहीं कस सकी। पुलिस की प्लानिंग पूरी तरह से फेल साबित हुई। ग्रामीणों में पुलिस-प्रशासन के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा है।