लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर पार्टी पश्चिमी यूपी के नेता को अध्यक्ष की जिम्मेदारी देना चाहती थी। जाट वोट बैंक को साधने के लिए चौधरी सबसे मजबूत नेता माने जा रहे थे। इससे पश्चिमी यूपी की करीब डेढ़ दर्जन जाट बहुल लोकसभा सीटों पर भाजपा को फायदा हो सकता है। पूरे प्रदेश में भी पिछड़े वोट बैंक को साधने में मदद मिलेगी। चौधरी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के करीबी हैं और पुराने स्वयं सेवक हैं।
भाजपा को मिल सकता है अनुभव का लाभ
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी में 80 में से 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी। यही नहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रदेश की सत्ता में वापसी की थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के सामने उसे पश्चिमी यूपी में मुरादाबाद मंडल की लोकसभा की सभी छह सीटें (मुरादाबाद, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, संभल और रामपुर) गंवानी पड़ी थीं।
सहारनपुर मंडल में सहारनपुर सीट भी भाजपा हार गई थी। मुजफ्फरनगर में मामूली मतों से जीत हासिल की थी। मेरठ और बागपत लोकसभा सीट पर भी भाजपा की जीत का अंतर कम रहा था। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में सपा-रालोद गठबंधन का प्रदर्शन बेहतर रहा है। पहले की तुलना में गठबंधन की सीटें बढ़ीं।
जाट मतदाताओं का झुकाव सपा-रालोद गठबंधन की ओर देखने को मिला। ऐसे में 2024 केलोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं को साधने की तैयारी मेें है। इस सियासी बिसात में भूपेंद्र चौधरी के संगठन के साथ जुड़े रहने का लंबा तजुर्बा, जाट बिरादरी और राजनीतिक अनुभव का लाभ भाजपा उठाना चाहती है।