मेरठ। वन्य क्षेत्र में मानव का हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका असर हस्तिनापुर वन्य क्षेत्र पर भी पड़ा है। वन्य क्षेत्र में पहले के मुकाबले काफी कमी आई है। हस्तिनापुर वन्य अभयारण्य के पुनर्गठन के बाद नए परिसीमन में 2273 वर्ग किमी से घटकर 1159 वर्ग किमी रह गया है। इसके कारण जैव विविधता का संतुलन भी लगातार बिगड़ता जा रहा है। जीव जंतुओं पर भी इसका प्रभाव पड़ा है। जैव विविधता का संतुलन बनाए रखने के लिए लोगों को जागरूक होना पड़ेगा। जीव जंतुओं की संख्या किसी भी तरह घटनी नहीं चाहिए, इसीलिए हर वर्ष 22 मई को जैव विविधता दिवस मनाया जाता है।
ये है जैव विविधता
पौधों, जीव जंतुओं में पाई जाने वाली अलग-अलग प्रकार की विशेषताएं जैव विविधता कहलाती हैं। इसमें सबसे छोटे बैक्टीरिया से लेकर सबसे बड़े पौधों और जानवरों तक, यहां तक कि हमारी अपनी प्रजातियों भी जैव विविधता में शामिल हैं। एक अनुमान के मुताबिक पृथ्वी पर जीवों की करीब एक करोड़ प्रजातियां पाई जाती हैं। वन्य जीव सदियों से हमारे सांस्कृतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
1114 वर्ग किमी घटा हस्तिनापुर वन्य जीव विहार
वन्य क्षेत्र में मानव सहभागिता के कारण हस्तिनापुर वन्य जीव विहार के नए परिसीमन में 1114 वर्ग किमी की कमी आई है। पहले जहां यह क्षेत्र पांच जिलों हापुड़, मेरठ, बिजनौर, अमरोहा और मुजफ्फरनगर में 2273 वर्ग किमी था, अब यह घटकर 1159 वर्ग किमी रह गया। इनमें सबसे अधिक कमी अमरोहा और बिजनौर में आई है। यहां इंडस्टि्रयल एरिया अधिक होने के कारण वन्य क्षेत्र कम हुआ है। हस्तिनापुर वन्य जीव विहार का गठन 1986 में हुआ था। 2019 में एनजीटी के आदेशों के क्रम में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से इसका पुन: सर्वे कराया गया। क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाए तो सर्वाधिक क्षेत्र 36510 हेक्टेयर मेरठ का है। डीएफओ राजेश कुमार ने बताया कि इस वर्ष आए परिसीमन में वन्य क्षेत्र सबसे अधिक बिजनौर और अमरोहा में घटा है। अब वन्य क्षेत्र के एक किमी दायरे में ईको सेंसेटिव जोन स्थापित किया जाएगा जहां बिना अनुमति के काई कार्य नहीं किया जा सकेगा।
जीवों की संख्या भले ही कम हो पर प्रजातियों नहीं घटनी चाहिए
पूर्व आईएफएस धर्मवीर कपिल ने कहा कि जैव विविधता का मतलब जो जीव जंतु हमारे आसपास हैं, उनमें कमी नहीं आनी चाहिए। उनकी संख्या भले ही कम हों, लेकिन प्रजातियों में कमी नहीं आनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिए कि पानी को प्रदूषित न होने दें, जंगल को न काटे, पौधरोपण अधिक से अधिक करें, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ न करें।
विवि के छात्रों ने भी किया शोध
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग की एचओडी डॉ. नील जैन गुप्ता ने बताया कि विभाग के छात्रों की ओर से भी जैव विविधता पर शोध किया गया है। उन्होंने कहा कि मानव सहभागिता वन्य क्षेत्र में बढ़ना इसके असुंतलन का बड़ा कारण है। मनुष्य का प्रभाव वन क्षेत्र में नहीं बढ़ना चाहिए। आजकल वन क्षेत्र में इंडस्ट्री डवलप होती जा रही हैं जो पर्यावरण के विनाश का कारण बन रही है।
हस्तिनापुर वन्य क्षेत्र का नया परिसीमन हेक्टेयर में
शहर गांवों की संख्या वन्य क्षेत्र भूमि कुल भूमि
मेरठ 114 5547.26 36510
हापुड़ 22 681.12 5447.65
मुजफ्फरनगर 108 8393.07 29743.29
बिजनौर 142 3892.47 24656.47
अमरोहा 71 6639.74 19558.92
कुल 457 25253.65 115916.33