गांव के बीच में स्थित मोटो की चौपाल पर होने वाली इस सभा का नेतृत्व बलिया के रामस्वरूप शर्मा कर रहे थे। अंग्रेजों ने रामस्वरूप शर्मा की गर्दन को कलम कर दिया था। ठाकुर देवी सिंह, चेतनलाल, रणधीर सिंह, फकीरा, छुट्टन, बलजीत, शिवचरण, रघुवीर, ताराचंद, बाबूराम शर्मा, मुख्तियार, जमादार सिंह को जेल में डाल दिया था। कई लोगों को 12-12 वर्ष की कैद की सजा दी गई थी। इनमें प्रहलाद सिंह, फतह सिंह, लटूर सिंह, बोबल सिंह, रणधीर सिंह, कश्मीर सिंह, महावीर सिंह, बनी सिंह, प्रेम सिंह, मलखान सिंह, शिवचरण सिंह, नत्थूराम शर्मा, अमी सिंह, केन सिंह, देवी सिंह, पृथ्वी सिंह, जम्मू उर्फ जुगमंदर दास, मधू शर्मा, दाती सिंह, देवदत्त शर्मा, जीत सिंह व करम सिंह आदि के नाम शामिल हैं।
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क्रांतिकारी ग्रामीणों के विरोध से बौखलाई अंग्रेजी हुकूमत ने भामौरी गांव को बागी घोषित करते हुए तोप से उड़ाने का आदेश दे दिया। अंग्रेजी तोप गांव की तरफ चल पड़ी थी।
तोप का चालक लियाकत अली हिंदुस्तानी था, जिसने भामौरी गांव से पहले पड़ने वाले गांव झिटकरी के तालाब में तोप को फंसा दिया, जो काफी मशक्कत के बाद भी दो दिन तक बाहर नहीं निकली। गांधी जी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की पैरवी के बाद अंग्रेजों ने गांव को तोप से उड़ाने का फरमान वापस ले लिया।
अंग्रेजों को चकमा देने के लिए बदलते थे भेष
दिनेश प्रधान ने बताया कि क्रांतिकारी महावीर सिंह बम बनाना जानते थे। अंग्रेजी सिपाहियों को चकमा देने के लिए वह भेष बदलते रहते थे और पुलिस उनकी तलाश में लगी रहती थी। स्वतंत्रता की इस लड़ाई में रणधीर सिंह भी शामिल रहे। हमले के दौरान उन्हेें अंग्रेजी सिपाहियों ने गिरफ्तार जेल में डाल दिया। देश की आजादी के बाद तत्कालीन भारत सरकार ने जेल से रिहा करने के आदेश दिए।
जवाहरलाल नेहरू पहुंचे थे भामौरी
70 वर्षीय उदयवीर सिंह बताते हैं कि भामौरी में हर साल शहीदों की शहादत को याद करते हुए ग्रामीण कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। भामौरी को शहीदों का गांव घोषित किया गया। शहीद स्थल में स्तंभ लगवाया गया। स्तंभ पर शहीदों के नाम आज भी अंकित हैं। शहीदों को नमन करने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू खुद भामौरी पहुंचे थे।