अन्नु रानी ने कहा कि उन्होंने बांस की जैवलिन से अभ्यास किया। प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए ट्रेन में सीट नहीं मिलने पर नीचे लेटकर जाना पड़ता था। कभी-कभी खेल छोड़ने के विचार भी आने लगते हैं, लेकिन ऐसे ही समय में यदि दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ा जाए तो सफलता एक दिन जरूर मिलती है।
बताया कि 15 साल पहले मेरे खेल के प्रति समाज के नजरिए को देखते हुए पिता भी नहीं चाहते थे कि वह खेल में जाए। जिसके बाद प्रभात आश्रम के स्वामी विवेकानंद ने परिवार को भरोसा दिलाया। कई बार आसपास कोई उम्मीद नहीं होने के बाद भी वह लक्ष्य से पीछे नहीं हटी। दिन रात मेहनत का नतीजा है कि आज सभी के आशीर्वाद से इस मुकाम पर पहुंची हूं।
अन्नु ने कहा कि युवाओं को किसी भी चुनौतियों का सामने क्यों ना करना पड़े लेकिन अपने परिश्रम में कमी नहीं छोड़नी चाहिए। पिता अमरपाल कहते हैं मुझे तो पहले यह डर सताता था कि बेटी को खेलने के लिए दूर-दूर शहरों में जाना पड़ेगा। लेकिन आज अन्नू की मेहनत और संघर्ष ने गांव से लेकर देश विदेश की दूरी को घटा दिया है। क्षेत्र के हर कोई ग्रामीण अन्नु रानी को अपनी बेटी मानकर गर्व महसूस कर रहे हैं। उन्हें इससे बड़ी और क्या सोहरत चाहिए।
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