जिले में युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। ऐसा कोई दिन नहीं जब जिले में आत्महत्या की घटना न होती हों। कहीं कोई फंदा लगाकर जान दे देता है तो कहीं जहर खाने से अपने जीवन को खत्म कर लेता है। जान देने वालों में सिर्फ व्यस्क ही नहीं, बल्कि 14-17 साल की आयु वाले किशोर भी शामिल हैं। आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं समाज के लिए चिंता का सबब बनती जा रही हैं। खासतौर से किशोर व युवा वर्ग में इस प्रवृत्ति को बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया से गहरे लगाव और अपनों से दूरी को कारण माना जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो हर साल आत्महत्या के मामलों में वृद्धि हो रही है। वर्ष 2021 में 20 से अधिक घटनाएं सामने आई थीं। वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 25 हो गई। वर्ष 2023 में 30 से अधिक आत्महत्या के मामले में रहे। वर्ष 2024 में बीते आठ महीने में 20 मामले आ चुके हैं। ग्रामीण क्षेत्र में होने वाली तमाम घटनाओं में लोग पुलिस को सूचना दिए बिना शव का अंतिम संस्कार भी कर देते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि वास्तविकता को दरकिनार कर दिखावे में फंसना युवाओं में आत्महत्या की बड़ी वजह है। सुविधाभोगी दौर में युवा वर्ग में धैर्य और जूझने की प्रवृत्ति कम हो रही है। वह जल्दी से कुछ पाने की इच्छा रखते हैं और ऐसा न होने पर टूट जाते हैं। आवेश में आकर गलत कदम उठा लेते हैं। ऐसी दशा में अभिभावकों पर जिम्मेदारी अधिक है। उन्हें अपने बच्चों और परिवार के सदस्यों की मानसिक दशा पर निगरानी रखनी चाहिए। मधुबन थाना क्षेत्र के कटघरा महलू के मटूरीलाल ग्रामसभा में गत बुधवार को एक महिला का शव संदिग्ध परिस्थिति में उसके कमरे में ही फंदे पर लटकता मिला। मृतका की पहचान स्नेहा (32) पत्नी पंकज कुमार के रूप में हुई थी। दोहरीघाट के लोहारपुरा ट्रैक पर मंगलवार देर शाम लगे पोल से एक व्यक्ति ने गृह कलह से परेशान होकर फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली। शहर कोतवाली थाना क्षेत्र के ब्राह्मण टोला मोहल्ले में रविवार देर रात एक युवक ने संदिग्ध परिस्थितियों में फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली थी।
युवाओं में आत्महत्या करने के कई कारण हो सकते हैं। जब बच्चा किशोरावस्था में पहुंचता है तो बड़े-बड़े लक्ष्य तय कर लेता है। युवावस्था मेें पहुंचने पर लक्ष्य पूरा न होने पर अवसाद में चला जाता है। इसके बाद आत्महत्या का कदम उठा लेता है। दूसरा कारण टीवी सीरियल, फिल्म सहित इंटरनेट पर आत्महत्या करने के संबंध में विस्तार से दिखाया जाता है। इससे बच्चों पर विपरीत असर पड़ता है। ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगाए जाने की जरूरत है। बच्चों की बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक काउंसिलिंग कराए जाने के साथ ही नजर रखने की जरूरत है। उनको सकारात्मक दिशा में लगाया जाना चाहिए। -डॉ. योगेेंद्र नाथ चौबे, असिस्टेंट प्रोफेसर मनोविज्ञान
डीसीएसके पीजी कॉलेज मऊ