रमजान का मुबारक महीना रहमतों और बरकतों वाला है। यह महीना हमें बुराइयों से दूर रखता है। साथ ही इंसानियत का पैगाम भी देता है। यह बातें क्षेत्र के करीमाबाद निवासी मौलाना हाशिम ने कहीं। बताया कि रमजान में खुद को खुदा की राह में इबादत के लिए लगाना अपनी दुनिया और आखिरत को संवारना है। रमजान प्यार, भाईचारे और इंसानियत का भी पैगाम देता है। इस पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों का खजाना लुटाता है। कहा कि रोजा सब्र का नाम है। हमें रमजान के पाक महीने में एक-दूसरे के साथ मुहब्बत का पैगाम देकर इंसानियत मजबूत करनी चाहिए। रोजा रखें, नमाज पढ़ें, इससे ईमान मजबूत होता है। गरीबों को खाना खिलाकर हम दुआएं हासिल करें। कहा कि रोजे रखने का असल मकसद महज भूख-प्यास बर्दाश्त करना नहीं है। बल्कि रोजे की रूह दरअसल नफ्स पर काबू, अल्लाह के तरीके पर अकीदत और सही राह पर चलने के इरादे पर मुस्तैदी से अमल में बसती हैं। रोजे के दौरान झूठ बोलने, चुगली करने, किसी पर बुरी निगाह डालने एवं हर छोटी से छोटी बुराई से दूर रहना जरूरी है।उन्होंने बताया कि रमजान के महीने में ही अल्लाह तआला ने कुरान शरीफ को नाजिल किया। बताया कि रमजान के महीने को तीन हिस्सों (अशरों) में बांटा गया है। पहले दस दिनों में अल्लाह अपने रोजेदार बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरे 10 दिनों में अल्लाह रोजेदारों के गुनाह माफ करता है और तीसरे 10 दिनों में दोजख की आग से निजात देता है। इसलिए पाक महीने की इन बरकतों, रहमतों को हासिल करने में कोताही न करें। अल्लाह को राजी करें और इबादत में मशगूल रहें।