मझवारा। गुरु पूर्णिमा पर्व के उपलक्ष्य में बाजार स्थित राम जानकी मंदिर परिसर में चल रहे मानस पाठ में
कथा वाचक ने भगवान शिव के माता पार्वती के साथ विवाह तथा सती के पति को पिता से अपमानित करने पर दक्ष प्रजापति के यज्ञ विध्वंस का प्रसंग सुनाया। इस दौरान श्रद्धालुओं के जयकारे से पंडाल गुंजायमान होता रहा। मानस केशरी कन्हैया दास महाराज ने कहा कि प्रजापति दक्ष अपने दामाद शिवजी से ईर्ष्या रखते थे। एक बार उन्होंने शिव जी को नीचा दिखाने के लिए यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने देवर्षियों, महर्षियों और देवताओं को आमंत्रित किया, किंतु अपनी पुत्री सती और शिव जी की उपेक्षा की। इस यज्ञ में महर्षि दधीचि को भी आमंत्रित किया गया था। तब क्रोधित सती ने स्वयं चिताग्नि उत्पन्न कर शरीर त्याग दिया। यह देख शिव के गणों ने यज्ञ को विध्वस कर दिया तथा प्रजापति दक्ष की गर्दन मरोड़ कर हवनकुंड में डाल दिया। महर्षि दधीचि ने शिव को अनुपस्थित देखकर दक्ष को समझाते हुए कहा कि राग-द्वेष की कुत्सित भावना से किया गया कोई भी सत्कर्म विनाश का कारण बनता है। इसलिए अब भी समय है, हठ त्यागकर भगवान महादेव को सादर आमंत्रित करें।यह सुनते ही प्रजापति दक्ष शिव जी के प्रति कटु वचनों का प्रयोग करने लगे। ऐसे में महर्षि दधीचि छोड़कर अपने आश्रम को लौट आए।