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मेडिकल माफिया: मऊ में बिना रजिस्ट्रेशन चला रहे 200 अस्पताल, क्लीनिक

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मऊ। मेडिकल सिटी के नाम से पूर्वांचल में मशहूर हो चुका मऊ जिला अब इस मामले में बदनाम भी हो रहा है। जिले में मात्र 885 अस्पताल और क्लीनिकों का ही पंजीकरण है, 200 से अधिक अस्पताल, क्लीनिक बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। यहां पर मरीजों का इलाज कराना जान पर खेलना है।
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जिम्मेदारों की नाक के नीचे बिना डिग्री के चल रहे कई फर्जी अस्पताल, जिनकी पकड़ा इतनी मजबूत कि बलिया, गाजीपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में निजी एंबुलेंसकर्मियों से सांठ-गांठ कर अपने यहां मरीज भर्ती करा रहे हैं। चौंकाने वाली बात है कि स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के इन अस्पतालों के बारे में उस समय पता चलता है जब इन अस्पतालों में मरीज कोई हंगामा करते हैं या किसी मरीज की इलाज के दौरान मौत हो जाती है। लेकिन लंबी चौड़ी टीम के बाद भी इन अस्पतालों पर लगाम नहीं लग पा रही है, वहीं प्रशासन ने भी इस मामले में अब तक अपनी चुप्पी साध रखी है।

सीएमओ कार्यालय के आंकड़े ही जिले के चारों तहसील में फर्जी वाड़े की पुष्टि करते हैं। जहां कार्यालय में पूरे जनपद में कुल 53 क्लीनिक 32 अस्पताल और 65 डायग्नोस्टिक सेंटर पंजीकृत है। लेकिन हकीकत कोसों दूर हैं, केवल मऊ शहर में ही 50 से ज्यादा बिना रजिस्ट्रेशन के अस्पताल चल रहे हैं, जबकि जिले में यह आंकड़ा करीब दो सौ से ज्यादे का है। सूत्रों की मानें तो शहर के भीटी, बहादूरगंज मोड़, गाजीपुर तिराहा, सहादतपुरा, बलिया मोड़ स्थित ऐसे कई निजी अस्पताल हैं, जो जिले के अलावा बलिया, गाजीपुर जिले के निजी एंबुलेंस वालों से सांठगांठ कर रखे हैं। यह मरीजों को जिले के बड़े प्राइवेट अस्पताल के नाम पर झांसा देकर उन्हें इस अस्पताल में भर्ती करा देते हैं, जिसके एवज में इन अस्पताल संचालकों से मोटा कमीशन मिलता है। चौंकाने वाली बात है कि इसमें कुछ अस्पतालों को तो स्वास्थ्य विभाग पहले सीज भी कर चुका था, लेकिन कुछ दिनों बाद वह अस्पताल फिर से चलने लगे हैं। इस संबंध में सीएमओ डॉ. नंद कुमार का कहना है कि अस्पताल क्लीनिक और डायग्नोस्टिक सेंटर की जांच के लिए टीमें बनाई गई हैं जो नियमित रूप से जांच करती है साथ ही कहीं से भी कोई शिकायत मिलने के बाद भी जांच कर गलत पाए जाने पर कार्रवाई होती है।
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फर्जी अस्पतालों में पांच माह में पांच मौतें



मऊ। फर्जी अस्पताल संचालक अपने बचाव को लेकर बेहद सजग हैं, जहां इसमें कुछ तो आयुर्वेद विधा में पंजीयन कराकर ऐलोपैथिक उपचार करते हैं। वहीं कई तो बिना पंजीयन के संचालित होते हैं। मिलीभगत के चलते स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार सबकुछ जानकर अंजान बने रहते हैं, उन्हें इन अस्पतालों की जानकारी किसी अप्रिय घटना पर ही होती है। बीते पांच माह में इन अस्पतालों में इलाज के दौरान पांच लोगों की मौत हो गई, इसका खुलासा तो तब हो गया मौत के बाद मरीजों के परिजनों के हंगामा किया। वरना कई मामलों में डरा धमका कर या पैसे ले देकर मामले को दबा दिया जाता है।



केस एक -



बीते माह में मधुबन के कटघरा में फर्जी अस्पताल में महिला की उपचार के दौरान मौत पर डॉक्टर अस्पताल पर ताला बंद कर फरार हो गया था।



केस नंबर दो -



शहर के मिर्जाहादीपुरा तिराहा स्थित एक निजी अस्पताल में जच्चा और बच्चा की मौत के बाद शिकायत की जांच के दौरान अस्पताल का संचालन ही अवैध पाया गया।



केस तीन -

नगर के मिर्जाहादीपुरा के अस्पताल में एक महिला के शरीर में खून नहीं होने पर ऑपरेशन कर दिया गया। हालत गंभीर होने पर रेफर करने के दौरान ही उसकी मौत हो गई।



केस चार -



घोसी तहसील के मझवारा में महिला की फर्जी अस्पताल में ऑपरेशन के बाद मौत हो गई, मरीज की मौत के बाद फर्जी चिकित्सक अस्पताल पर ताला बंद कर भाग गया।



केस नंबर पांच -



हलधरपुर थाना के नसीराबाद कला चट्टी अस्पताल में भर्ती मरीज का गलत उपचार से मौत हो गई थी। शिकायत मिलने पर जांच टीम पहुंची तो अस्पताल पर ताला बंद मिला था।
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