मऊ। आयुष्मान योजना जिले में कुछ हद तक ही सफल होती दिख रही। वजह शासनस्तर की कमी और स्थानीय अधिकारियों की लापरवाही है। दरअसल योजना के तहत जिले में एक लाख से ज्यादा परिवार शामिल हैं, लेकिन इनके इलाज के लिए पर्याप्त संख्या में अस्पताल नहीं जुड़ सके हैं। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर योजना को लेकर गठित मानीटरिंग टीम की उदासीनता के चलते निजी अस्पताल मनमानी कर रहे। नतीजतन, मरीजों को इलाज कराने में दुश्वारियां आ रहीं। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान योजना को हर वर्ग गरीबों के हितों में सरकार का एक सकारात्मक कदम बताया जा रहा है। लेकिन जिले में इस योजना के तहत आवश्यकता पड़ने पर इलाज कराने को लेकर परेशानी उठानी पड़ रही है। शुरू में निजी अस्पतालों का आयुष्मान मरीजों को लेकर काफी सकारात्मक रवैया रहा, लेकिन शासन से मिलने वाली राशि के भुगतान में स्थानीय अधिकारियों द्वारा हीलाहवाली से यह रवैया नकारात्मक होने लगा। परिणाम यह है कि बीते कुछ माह में निजी अस्पतालआयुष्मान मरीजों के इलाजमें कोताही बरत रहे हैं। अगर दवाब पड़ने पर निजी अस्पताल मरीजों को भर्ती कर भी ले रहे तो उनके साथ सौतेला व्ययवहार अपना रहे हैं। दूसरी तरफ निजी अस्पतालों से मायूस होकर सरकारी अस्पतालों का रुख करने वाले मरीजों को कभी चिकित्सकों की कमी तो कभी संसाधन ना होने का हवाला देकर लौटाया जा रहा। यहीं वजह हैं योजना के तहत 938 मरीजों का ही इलाज हो सका है। इसमें 344 ने निजी और175 ने सरकारी अस्पताल में इलाज कराया। जबकि 419 मरीज वाराणसी, गोरखपुर या दूसरे जिलों के अस्पताल में पहुंचे। मरीज और उसके परिवारों का कहना है कि नि:संदेह योजना गरीबों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं हैं, लेकिन इसमें पंजीकृत निजी अस्पतालों की संख्या अधिक हो और सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक और संसाधन मुहैया हो तो इलाज में आ रही परेशानियां दूर होने से योजना बेहद सफल होगी।