मऊ। रोजी रोजगार की तलाश कर अपना जीवन संवारने के लिए घर बार छोड़कर परदेश गए लोगों को कोरोना ने वहां भी सुकून से जीने नहीं दिया। लॉकडाउन में जब लोगों को भूख ने सताया तो उन्हें घर की याद आई। लुधियाना से श्रमिक स्पेशल ट्रेन के यात्रियों ने डबडबाई आंखों से अपने जद्दोजहद की कहानी सुनाई। दोहरीघाट ब्लाक निवासी संजय ने कहा कि वह लुधियाना में एक कपड़ा बनाने की कंपनी में हेल्पर का काम करता था। लॉकडाउन में कंपनी बंद हुई तो भोजन के लाले पड़ गए। ऐसे में घर आने के सिवाय कोई चारा नहीं सूझा। परदेश में कोई भोजन के लिए पूछने वाला भी नहीं था। घोसी ब्लाक के रसड़ी गांव निवासी सुग्गन ने बताया कि वह टायर का तार बनाने वाली कंपनी में और रामहरि पलंबरी का काम करता था। दोनों ने बताया कि लॉकडाउन में काम बंद हो गया। कुछ दिनों तक तो उनके महाजनों ने उन्हें खाना दिया, लेकिन बाद में हाथ खड़े कर दिए। परिणाम स्वरूप भूखों सोने की नौबत आ गई। बाहर निकलने बेरहम पुलिस की मार थी जबकि अंदर रहने पर भूखा पेट जीने नहीं दे रहा था। ऐसे में घर जाने के सिवा कुछ दिखाई नहीं दिया। पता चला कि ट्रेन जा रही तो उम्मीद की किरण दिखी और घर का रुख कर लिया। घोसी के अरदौना गांव निवासी कृष्णा एक कंपनी में बतौर फिटर काम करता था। लेकिन लॉक डाउन में उसका हुनर उस समय धरा रह गया, जब कंपनी बंद हो गई। कर्ज लेकर भोजन-पानी का जुगाड़ किया। लेकिन आखिर कब तक ऐसे चलता। घर की नमक रोटी याद आई तो फिर वह रुक नहीं सका।