मऊ। कोरोना महामारी में लगभग हर वर्ग जद्दोजहद कर रहा है, लेकिन सबसे बड़ी मार प्रवासी मजदूरों पर पड़ी है। जो अपनी बसी बसाई छोटी गृहस्थी को उजाड़ कर मजबूरी में घर की राह लिए हैं। बेहसाहरा हो चुके इन मजदूरों की आंखों में बेबसी के आंसू हर किसी को द्रवित कर देने को काफी हैं। रूंधे गले से प्रवासी ने बताया कि मजबूरी, बेबसी और लाचारी ने उसे घर की राह दिखा दी।लॉक डाउन में वो दिन गुजारे हैं जो जिंदगी भर याद रहेंगे। मुंबई कमाने गए थे लेकिन यह दिन भी देखने को मिलेगा कभी सोचा भी न था। पांच दिनों पूर्व महाराष्ट्र के पुणे से चलकर रतनपुरा ब्लाक स्थित मड़ई गांव पहुंचे नवीन कुमार ने बताया कि वो महराष्ट्र के पूणे में सब्जी बेचने का काम करते थे। लेकिन कोरोना काल में लॉक डाउन के बाद सब कुछ बंद हो गया। जिसके कारण वे किसी तरह से जद्दोजहद करते हुए अपना रजिस्ट्रेशन कराकर ट्रेन से मऊ पहुंचे। जहां से जिला प्रशासन ने उन्हें रोडवेज बस की सुविधा से उसे रतनपुरा स्थित घर को पहुंचाने का काम किया। नवीन ने बताया कि वो गांव में रहकर खेती किसानी का काम करेंगे। नवीन के अनुसार घर आने के लिए महाराष्ट्र जैसे परदेश में उसे ट्रेन में बैठने के लिए कितना जद्दोजहद करना पड़ा, जिसका बयान करने के लिए उनके पास शब्द रहीं है। फिलहाल नवीन होम क्वारंटीन होकर घर पर है। प्रवासी मजदूर रतनपुरा निवासी राधेश्याम ने बताया कि वे गुजरात के बालसाड में प्राइवेट नौकरी थे। कोरोना संक्रमण बढ़ने के बाद वे नौ दिनों पहले ही बालसाड से निकलकर ट्रक से किसी तरह मध्यप्रदेश पहुँचे। उसके बाद मध्यप्रदेश से ट्रक में जद्दोजहद करते हुए बनारस पहुँचे और उसके बाद कुछ दूर पैदल और फिर किसी प्राइवेट वाहन का सहारा लेकर अपने मऊ पहुँचे और अपनी थर्मल स्क्रीनिंग कराकर मऊ से पैदल ही अपने घर को चले गए । घर जाकर वो होम क्वारेंटाइन हैं। हालांकी अब प्रदेश सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन द्वारा बार्डर पर ही रोडवेज की बसों को लगाकर प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक भेजवाने का काम किया जा रहा है।