डीएसआर तकनीक द्वारा धान की बुवाई को देखते किसान।संवाद
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मऊ। कृषि विज्ञान केंद्र पिलखी के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. एलसी वर्मा ने बताया कि खेती की पुरानी पद्धतियों को जीवित रखने के लिए किसानों को पूर्वजों द्वारा अपनाई गई तकनीक पर फिर से लौटना होगा। डीएसआर विधि से धान की सीधी बुवाई खेती की बेहतर तकनीक है। बताया कि इस विधि से धान की बुवाई मे बीज, खाद एवं पानी कम लगता है। धान की परंपरागत बुवाई की अपेक्षा डीएसआर विधि ईंधन, समय और खेती की लागत के नजरिए से भी बहुत फायदेमंद है। डीएसआर में ईंधन का उपयोग परंपरागत बुवाई की तुलना में कम होता है। जमीन एवं जल-संसाधन संरक्षण के साथ-साथ मजदूरी व ऊर्जा की बचत होगी। बुवाई जून के दूसरे या तीसरे सप्ताह में करना चाहिए। शस्य वैज्ञानिक डॉ. अंगद प्रसाद ने बताया कि इससे सभी धान के पौधों की जड़ें जल्दी सूखती नहीं हैं। सिंचाई की जरूरत कम हो जाती है। यह तकनीक पानी बचाने व खरपतवार की रोकथाम करने में सक्षम है। फसल सुरक्षा वैज्ञानिक लाल पंकज सिंह ने कहा कि बुवाई के तुरंत बाद व सूखी बुवाई में 0-3 दिन बाद प्रीइमरजेंस खरपतवारों के नियंत्रण के लिए पैंडीमैथालीन 1.3 लीटर प्रति एकड़ की मात्रा छिड़काव करें। मृदा वैज्ञानिक डॉ. चंदन सिंह बताते हैं कि खेत को दो-तीन जुताई लगाकर तैयार करें। फिर सुपर सीडर मशीन से तीन से पांच सेमी गहराई पर बुवाई करें। धान की पहली सिंचाई बरसात नहीं होने पर बुवाई के 15 दिन बाद करें।