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गेहूं के खेत में पड़े अवशेष को जला रहे किसान

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मऊ। खेतों में गेहूं के अवशेष जलने से रोकने के लिए भले ही सरकार सख्त होने का दावा कर रही हो, किंतु किसानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। किसान धड़ल्ले से फसलों के अवशेष जलाकर सरकार और प्रशासन के दावों की पोल खोल रहे हैं। नतीजा यह निकल रहा है कि अवशेष जलने पर उठने वाला धुआं पर्यावरण को पदूषित कर रहा है। इसका दुष्प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जिले में 90 हजार हेक्टेयर में गेहूं की खेती होती है।मजदूरों की किल्लत के चलते जिले में हार्वेस्टर से गेहूं के कटाई का प्रचलन तेजी से बढ़ा है।अब गेहूं कटाई का काम ज्यादातर कंबाइन से हो रहा है। इसके चलते खेतों में गेहूं के अवशेष बच जाते हैं। ऐसे में परदहां, रतनपुरा, दोहरीघाट, फतहपुर मंडाव, मुहम्मदाबादगोहना, रानीपुर सहित विभिन्न ब्लाक क्षेत्रों में किसान धड़ल्ले से खेतों में पड़े गेहूं के अवशेष को आग के हवाले कर रहे हैं। इससे वातावरण प्रदूषित हो रहा है, लेकिन किसानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञ नेफोर्ड के कृषि विशेषज्ञ संतोष मिश्रा की माने तो इस आग से किसानों की धरती में भी नुकसान हो रहा है। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति कमजोर पड़ जाती है। जमीन से फसलों को फायदा पहुंचाने वाले मित्र कीट भी मर जाते हैं। परंतु किसान इसकी कोई परवाह नहीं कर रहे हैं। हालांकि किसान इस सब से अवगत हैं, लेकिन अवशेष जलाने को वे सस्ता मानते हैं। यदि वे अवशेषों को बुआई कर नष्ट करे तो इस पर खर्च काफी करना पड़ता है। इससे किसान बचना चाहता है। गेहूं के अवशेष जलने से रोकने के लिए सरकार ने कड़ा कानून बनाया हुआ है, लेकिन किसानों पर इसका कोई असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। किसानों के हौसले बुलंद होने के पीछे विभाग की ढुलमुल नीति भी रही है। विभागीय अधिकारी मात्र हवा हवाई बयान तो जारी कर देता है, लेकिन उसके बाद कोई ठोस कार्रवाई करने के लिए आगे नहीं आता। उधर किसान भी इस कार्रवाई से बचने के लिए कई तरह के तर्क अपने पास रखते हैं। बिजली की तारों से उठने वाली चिंगारी से आग लगना या फिर किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा आग लगाना आमतौर पर बताया जाता है।
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